तौसीफ कुरैशी
चुनाव में जीत का सबसे आसान हिसाब यह है कि कौन जीता और कौन हारा। मगर राजनीति का असली हिसाब कभी-कभी जीत के आंकड़े में नहीं, जीत के फासले में छिपा होता है। राजस्थान के निकाय चुनाव में भाजपा जीत गई है। उसके पास कांग्रेस से ज्यादा वोट हैं, ज्यादा वार्ड हैं और ३०९ शहरी निकायों में वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। लेकिन इस जीत के बीच एक आंकड़ा ऐसा है, जिसे पढ़े बिना शायद पूरी तस्वीर पढ़ी ही नहीं जा सकती।
फासला और फैसला
९९,६१५ इतने ही वोटों का फासला भाजपा और कांग्रेस के बीच रह गया है। भाजपा को ३७,३५,५६७ वोट मिले और कांग्रेस को ३६,३५,९५२। यानी भाजपा का वोट शेयर ३५.१८ प्रतिशत और कांग्रेस का ३४.२४ प्रतिशत रहा। अंतर महज ०.९४ प्रतिशत का है। अब जरा तीन साल पीछे जाइए। २०२३ के विधानसभा चुनाव में भाजपा को १.६६ करोड़ से ज्यादा और कांग्रेस को १.५७ करोड़ से ज्यादा वोट मिले थे। दोनों के बीच अंतर करीब ८.४६ लाख वोट का था। यानी विधानसभा से निकाय तक आते-आते दोनों प्रमुख दलों के बीच वोटों की दूरी लाखों से घटकर करीब एक लाख रह गई। यह अपने आप में चुनाव का पैâसला नहीं बदलता, लेकिन राजनीति के लिए सवाल जरूर पैदा करता है। और राजनीति में सवाल ही तो सबसे बड़ी घंटी होता है। निकाय चुनाव का भूगोल भी कम दिलचस्प नहीं है। ३०९ शहरी निकायों और १०,२४५ वार्डों में मुकाबला हुआ। भाजपा ने ४,१७९ वार्ड जीते, कांग्रेस ३,६१३ पर रही और निर्दलीयों ने २,२७३ वार्डों में जीत दर्ज की इनमें कांग्रेस के बागी शामिल हैं। इसका मतलब यह भी है कि राजस्थान का मतदाता केवल दो दलों के बीच बंद नहीं है। करीब २९ लाख वोट निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में गए। यानी भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबले के साथ-साथ तीसरी ताकत भी मैदान में है वह उम्मीदवार जो पार्टी के टिकट से बाहर है, मगर मोहल्ले, कस्बे और वार्ड में आदमी को अपना लगता है। यहीं से अगले पंचायत चुनाव की कहानी शुरू होती है। शहर में भाजपा और कांग्रेस लगभग बराबर की दूरी पर आ गए हैं।
शहर से गांव की ओर
अब गांव की बारी है और गांव की राजनीति शहर से अलग होती है। यहां जातीय समीकरण हैं, स्थानीय रिश्ते हैं, किसान हैं, पंचायत है, सरपंच है, प्रधान है और उम्मीदवार का अपना व्यक्तिगत प्रभाव भी है। इसलिए निकाय चुनाव को पंचायत चुनाव का सीधा ट्रेलर मान लेना जल्दबाजी होगी। मगर इसे नजरअंदाज करना उससे भी बड़ी भूल हो सकती है। कांग्रेस के लिए यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह भाजपा के शहरी वोट आधार के बेहद करीब पहुंची है। भाजपा के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि सत्ता में रहते हुए भी वह कांग्रेस से केवल ९९ हजार वोट आगे है और अगर पंचायत चुनाव में कांग्रेस ग्रामीण क्षेत्रों में अपना पारंपरिक आधार सक्रिय कर लेती है, तो फिर बहस केवल कांग्रेस की वापसी की नहीं होगी। तब सवाल भाजपा से पूछा जाएगा। २०२३ का अतिरिक्त वोट आखिर गया कहां? क्या वह निर्दलीयों में बंट गया? क्या स्थानीय उम्मीदवारों ने पार्टी से ज्यादा असर पैदा किया? क्या सरकार की योजनाओं का लाभ मतदाता तक पहुंचा, मगर उसका राजनीतिक श्रेय नहीं पहुंचा? क्या संगठन चुनाव के समय सक्रिय हुआ या पूरे पांच साल जमीन पर सक्रिय रहा? और सबसे बड़ा सवाल क्या सरकार और मतदाता के बीच वह राजनीतिक संवाद कमजोर हुआ है, जो किसी भी सत्तारूढ़ दल की सबसे बड़ी पूंजी होता है? इन सवालों के जवाब अभी निकाय चुनाव नहीं देता। मगर सवाल पूछने का अधिकार जरूर देता है। एक और बात ध्यान देने लायक है।
कांग्रेस की जीत!
२०२६ के निकाय चुनाव में भाजपा की बढ़त केवल वोटों में नहीं, वार्डों में भी बनी हुई है। लेकिन लगभग एक प्रतिशत वोट के अंतर के बावजूद दोनों दलों के वार्डों की संख्या में बड़ा अंतर है। इसका अर्थ यह है कि वोट का भौगोलिक वितरण भी परिणाम तय कर रहा है। इसलिए ९९ हजार को कांग्रेस की जीत और भाजपा की हार का प्रमाण माना जा रहा है, जितना इसे मामूली आंकड़ा मानकर आगे बढ़ जाना। चुनाव कोई एक्स-रे मशीन नहीं कि एक तस्वीर निकली और शरीर का पूरा हाल सामने आ गया। लेकिन कभी-कभी एक्स-रे में वह चीज दिखाई दे जाती है, जिसे ऊपर से देखने पर आंख नहीं पकड़ती। अब पंचायत चुनाव असली अग्निपरीक्षा होगी। शहर ने कहा मुकाबला करीब है। गांव क्या कहेगा, यह अभी बाकी है। अगर गांव ने भी शहर की तरह भाजपा और कांग्रेस के बीच दूरी को और कम कर दिया, तो राजस्थान की राजनीति में २०२३ का जनादेश सिर्फ इतिहास की किताब का अध्याय नहीं रहेगा, बल्कि २०२८ की तैयारी का सवाल बन जाएगा। क्योंकि सत्ता में बैठी पार्टी के लिए खतरे की घंटी हमेशा हार से नहीं बजती। कभी-कभी वह ९९,६१५ वोट के फासले से भी बज जाती है। और राजनीति में घंटी की आवाज छोटी हो सकती है, लेकिन अगर उसे समय रहते सुन लिया जाए तो बहुत कुछ बचाया जा सकता है।
सत्यमेव जयते
