पूरे देश में पटाखों पर प्रतिबंध लगना चाहिए। चीफ जस्टिस भूषण गवई ने राय व्यक्त की है कि पटाखों ने प्रदूषण की गंभीर समस्या पैदा कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पटाखों से वायु प्रदूषण आदि होता है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में पटाखों के निर्माण, बिक्री और उपयोग पर पहले ही प्रतिबंध लगा दिया है। इस पर चीफ जस्टिस साहब की महत्वपूर्ण राय है कि ‘स्वच्छ हवा का अधिकार केवल राजधानी दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों के नागरिकों तक ही सीमित क्यों होना चाहिए? अन्य शहरों और राज्यों के लोग भी इसी तरह के खतरों का सामना कर रहे हैं। देश के प्रत्येक नागरिक को स्वच्छ हवा का अधिकार है।’ चीफ जस्टिस ने कुछ भी गलत नहीं कहा, लेकिन क्या ऐन दिवाली के पहले चीफ जस्टिस द्वारा स्वच्छ हवा के अधिकार पर टिप्पणी करने से देश की हवा बदल जाएगी? मूल रूप से देश की हवा, पानी, आकाश और जमीन अब तानाशाहों के हाथों में है और तानाशाह हवा की दिशा, नदियों के प्रवाह को तय करते हैं। समान न्याय, संविधान के अनुसार न्याय यह अधिकार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने प्रत्येक भारतीय को दिया था, लेकिन क्या यह न्याय आज वास्तव में दिया जा रहा है? न तो स्वच्छ हवा है और न ही निष्पक्ष न्याय। जज आते हैं और प्रवचन झाड़कर चले जाते हैं, तो ऐसे में पटाखों पर प्रतिबंध और स्वच्छ हवा के अधिकार का और क्या होगा? महाराष्ट्र और देश में दिवाली के त्योहार पर पटाखे फोड़े जाते हैं। धार्मिक उत्सवों और विजय जुलूसों में पटाखों का इस्तेमाल होता है। देश के लाखों लोग पटाखा उद्योग पर निर्भर हैं। क्या इस पटाखा उद्योग पर प्रतिबंध लगाकर सुप्रीम कोर्ट सरकार को इन गरीब मजदूरों की आजीविका के लिए कोई योजना देने जा रहा है? दूसरी बात, हम यह मानने को तैयार नहीं हैं कि केवल पटाखे ही प्रदूषण या पर्यावरण क्षरण का कारण हैं। पिछले दस सालों में
महाराष्ट्र समेत देश में
व्यापारिक कारणों से जितनी वनों की कटाई, पेड़ों की कटाई और पहाड़ों की कटाई हुई है, उतनी तो ब्रिटिश काल में भी नहीं हुई होगी। चंद्रपुर, गढ़चिरौली आदि महाराष्ट्र के कई हिस्सों में वैध और अवैध रूप से खनन उद्योग चल रहा है और ईमानदारी के साथ ऊपर से नीचे तक हफ्ताबाजी चल रही है। महाराष्ट्र में पहाड़ों को सीधे और तिरछे काटकर जो तबाही मचाई जा रही है, वह सरकारी संरक्षण के बिना संभव नहीं है। मुंबई में ‘मेट्रो’ नामक विकास के नाम पर आरे के जंगल में हजारों पेड़ काट दिए गए और मुंबई को स्वच्छ हवा देने वाले फेफड़ों की ऐसी की तैसी कर दी गई। ऐसे समय में क्या मुंबईकरों को स्वच्छ हवा का अधिकार नहीं है? आरे के जंगल को मुंबईकरों को ‘ऑक्सीजन’ देने वाले फेफड़ों के रूप में जाना जाता है। आरे के जंगल को बचाने के लिए विरोध करने वाले पर्यावरण कार्यकर्ताओं को पुलिस ने पीटा और उनके खिलाफ मामले दर्ज किए गए। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली कई रासायनिक परियोजनाएं समुद्र और नदियों के किनारे लाई जा रही हैं और लोगों के स्वच्छ पानी के अधिकार का भी उल्लंघन किया जा रहा है। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर कोकण में भी एनरॉन से लेकर जैतापुर-नानार तक विनाशकारी रासायनिक परियोजनाएं लाने की कोशिशें हुई हैं। हमने पर्यावरण और कोकण के हितों को ध्यान में रखते हुए इन सभी परियोजनाओं का कड़ा विरोध किया। जब क्षेत्र के लोगों ने इन परियोजनाओं को रोका, तो उन पर बंदूकें तान दी गर्इं। अब पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने और नष्ट करने के लिए वाढवण बंदरगाह लाया जा रहा है। ये विनाशकारी उद्योग विकास के नाम पर सिर्फ कुछ उद्योगपतियों को और अमीर बनाने के लिए लाए जाते हैं और ऐसे समय में सर्वोच्च न्यायालय भी उन उद्योगपतियों और सरकार का साथ देता है। पटाखों पर प्रतिबंध लगाना आसान है, लेकिन छत्तीसगढ़, झारखंड, आरे में वनों की कटाई रोककर
पर्यावरण संरक्षण का पक्ष
लेना अदालतों के लिए भी मुश्किल होता जा रहा है। कचरा, रसायन, सीवेज का पानी नदियों और समुद्र में बहा दिया जाता है। कई जगहों पर यही पानी पीने के लिए इस्तेमाल होता है। इस रसायनयुक्त पानी के कारण नदियों और समुद्र की मछलियां मर जाती हैं और इसका सीधा असर मछली पकड़ने पर निर्भर लाखों परिवारों पर पड़ता है। प्लास्टिक कचरा जलाने वालों, कारखानों की चिमनियों से ‘राख’ छोड़ने वालों और बिजली संयंत्रों से गांवों में जहरीली राख की चादर बिछाने वालों के लिए पर्यावरण क्या मायने रखता है? पेड़ कार्बन डाईऑक्साइड को रोकते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं। इससे हवा साफ रहती है, लेकिन हम पेड़ों, जंगलों और वन्यजीवों के रक्षक, आदिवासियों को ही खत्म करने पर तुले हैं। प्लास्टिक पर अभी भी पूरी तरह से प्रतिबंध नहीं लगा है और ‘मीठी’ जैसी नदियों पर सैकड़ों करोड़ खर्च करने के बावजूद, वे साफ नहीं हुई हैं। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गंगा-यमुना की शुद्धि के लिए लाखों करोड़ रुपए पानी में डालने के बाद भी ये नदियां साफ नहीं हुई हैं। तो इस सरकारी पैसे का क्या हुआ? यह किसकी जेब में गया? प्रदूषण और पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने के अभियानों पर सैकड़ों करोड़ उड़ाए गए, लेकिन क्या फायदा हुआ? श्रीमती अमृता देवेंद्र फडणवीस और सिनेमा अभिनेता गणेश विसर्जन से मुंबई की चौपाटियों को साफ करने के लिए प्रचार अभियान चलाते हैं, लेकिन ये पहल केवल एक दिन के प्रचार के लिए हैं। कचरे से ज्यादा, कैमरावालों का ही कचरा बढ़ता है और प्रदूषण का स्तर बढ़ता है। पेड़ काटे गए और बिल्डरों को इसके लिए खुली जगह दी गई। अब पालघर जिले के तुंगारेश्वर अभयारण्य की वन भूमि भी अडानी समूह को दे दी गई है। मुंबई के अंधेरी लोखंडवाला में साढ़े तीन सौ एकड़ मैंग्रोव्ज जंगल को मलबा डंप करके नष्ट कर दिया गया और शिकायतकर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज किया जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश साहब, ये उद्योग स्वच्छ हवा के हत्यारे हैं। पहले इन उद्योगपतियों, बिल्डरों, ठेकेदारों को न्याय के कटघरे में लाइए। स्वच्छ हवा के लिए पटाखा प्रतिबंध एक अच्छी पहल है, लेकिन हालात ऐसे हैं कि कई मामले जो प्रदूषण बढ़ाते हैं और हवा व पानी को प्रदूषित करते हैं, उन मामलों में शांति छाई हुई है और कोर्ट ठंडा पड़ा हुआ है।
