पत्थर की मूरत पर शीश झुकाते हो,
घर में मां-बाबा के कमरे में जाने से कतराते हो।
दिन में एक बार कमरे में पानी का लोटा रख आते हो,
और अब उनके जीवन के बाद चौराहे पर
ठंडे जल की व्यवस्था करते हो।
तुम्हारे पैरों की आहट सुनते ही,
द्वार पर आ खड़ी होती है कुछ डरते-डरते मां।
तुम नजरें बचाकर निकल जाना चाहते हो,
फल, मिठाई रसोई में छिपा आते हो।
शक्कर की बीमारी का डर दिखाकर,
झूठे बहाने खोजते रहते हो।
तुम कैसे याद रखना चाहोगे, जब एक दिन
मां ने सारी दाल तुम्हें परोसी थी,
रख फांक अचार की, अपनी रोटी खाई थी।
आज उनके घुटनों-टखनों के दर्द पर निकली हाय को
कहते हो, सोने नहीं देते, कितना सताते हो।
रात-रात भर गोदी में उठाए फिरती थी मां,
बाबा हाथ से पंखा झुलाते थे।
क्योंकर रहेगा स्मरण तुम्हें,
अब तुम साहब कहलाते हो।
अब आया पितृपक्ष, श्राद्ध न करना उनका,
जीते-जी भर तुमने उन्हें रुलाया था।
जिन हाथों से जीते-जी आशीर्वाद मिलते थे,
उन गलबाहियों को नकारा तुमने।
चले जाने के बाद उनके कोई और प्रपंच न करना,
अन्नदान, पूजा, यज्ञ, तर्पण कुछ न करना।
जीवन में उनके तुम्हारे प्यार के दो बोले बोलों की कीमत थी,
अब नहीं चाहिए यह करनी दिखावे की।
–बेला विरदी
