रिकॉर्ड ऊंचाई से 25% गिरा सोना, जबकि युद्ध और महंगाई दोनों मौजूद थे
विशेष विश्लेषण
दुनिया भर के निवेशक वर्षों से यह मानते आए हैं कि युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती महंगाई के समय सोना सबसे सुरक्षित निवेश साबित होता है। लेकिन वर्ष 2026 ने इस पारंपरिक सोच को चुनौती दे दी है। मध्य-पूर्व में युद्ध, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और तीन वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंचती महंगाई के बावजूद सोने की कीमतों में लगभग 25 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
यह घटनाक्रम निवेशकों के लिए केवल बाजार की चाल नहीं, बल्कि निवेश की समझ को नए सिरे से परिभाषित करने वाला संकेत माना जा रहा है।
पांच महीनों में इतिहास और फिर गिरावट
वर्ष 2025 की शुरुआत में सोना लगभग 2,624 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस पर कारोबार कर रहा था। पूरे वर्ष में इसमें लगभग 64 प्रतिशत की तेजी दर्ज हुई और इस दौरान सोने ने 50 से अधिक बार नए सर्वकालिक उच्च स्तर बनाए।
जनवरी 2026 में यह तेजी उन्माद का रूप लेती दिखाई दी। सोना पहली बार 5,000 डॉलर प्रति औंस के स्तर को पार कर गया और 28 जनवरी, 2026 को लगभग 5,590 डॉलर प्रति औंस के ऐतिहासिक उच्च स्तर तक पहुंच गया। मात्र एक महीने में लगभग 27 प्रतिशत की तेजी ने दुनिया भर के निवेशकों को आकर्षित किया, लेकिन इसके बाद बाजार की दिशा अचानक बदल गई।
युद्ध शुरू हुआ, फिर भी सोना क्यों गिरा?
फरवरी और मार्च 2026 के दौरान अमेरिका, इज़राइल और ईरान से जुड़े मध्य-पूर्वी तनाव ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी। कच्चे तेल की कीमतें 114 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंका तक पैदा हो गई, जहां से विश्व के समुद्री मार्ग से भेजे जाने वाले लगभग एक-तिहाई कच्चे तेल का परिवहन होता है।
सामान्य परिस्थितियों में यह सोने के लिए अत्यंत सकारात्मक वातावरण माना जाता है, लेकिन इसके विपरीत सोना गिरना शुरू हो गया और जून 2026 तक लगभग 4,220 डॉलर प्रति औंस के स्तर तक आ गया।
असली कारण क्या है?
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, सोना केवल भय और महंगाई से नहीं चलता। उसकी कीमतों पर निवेशकों की अपेक्षाएं, ब्याज दरें, डॉलर की स्थिति, केंद्रीय बैंकों की नीतियां और बड़े निवेशकों की मुनाफावसूली भी प्रभाव डालती है।
जनवरी 2026 तक सोना इतनी तेजी से बढ़ चुका था कि उसमें पहले से ही युद्ध, महंगाई और वैश्विक जोखिमों का बड़ा हिस्सा शामिल हो चुका था। जब वास्तविक घटनाएं सामने आईं, तो बड़े निवेशकों ने मुनाफावसूली शुरू कर दी, जिससे कीमतों पर दबाव बढ़ गया।
यानी बाजार ने पहले ही संभावित संकटों का मूल्यांकन कर लिया था।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या संदेश?
भारत दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ताओं में शामिल है। देश में करोड़ों परिवार भौतिक सोना, गोल्ड ईटीएफ, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड और आभूषणों के रूप में निवेश करते हैं।
2026 की यह घटना बताती है कि केवल यह सोचकर सोना खरीदना कि “युद्ध है, इसलिए सोना बढ़ेगा”, अब पर्याप्त नहीं है। निवेशकों को वैश्विक ब्याज दरों, केंद्रीय बैंकों की नीतियों, डॉलर की मजबूती और बाजार में पहले से मौजूद उम्मीदों को भी समझना होगा।
भरतकुमार सोलंकी की राय
वित्त विशेषज्ञ भरतकुमार सोलंकी का मानना है कि निवेशकों को सोने को केवल भावनात्मक या पारंपरिक निवेश के रूप में नहीं, बल्कि एक रणनीतिक परिसंपत्ति (Strategic Asset) के रूप में देखना चाहिए।
उनके अनुसार, “सोना लंबी अवधि में मुद्रास्फीति से सुरक्षा प्रदान कर सकता है, लेकिन अल्पकाल में इसकी कीमतें केवल युद्ध या महंगाई से तय नहीं होतीं। यदि किसी परिसंपत्ति में अत्यधिक तेजी आ चुकी हो, तो सकारात्मक खबरें भी उसके लिए नई खरीदारी नहीं ला पातीं। इसलिए निवेशकों को चरणबद्ध निवेश, परिसंपत्ति विविधीकरण और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।”
आगे क्या?
वर्तमान में सोना लगभग 4,220 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के आसपास कारोबार कर रहा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में वैश्विक ब्याज दरों, अमेरिकी अर्थव्यवस्था, डॉलर इंडेक्स और केंद्रीय बैंकों की खरीदारी पर सोने की दिशा निर्भर करेगी।
वर्ष 2026 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बाजार हमेशा पाठ्यपुस्तकों के नियमों के अनुसार नहीं चलते। कभी-कभी युद्ध और महंगाई के बीच भी सोना गिर सकता है और यही कारण है कि निवेश में केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों और विश्लेषण के आधार पर निर्णय लेना आवश्यक है।
