मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : पुणे में गैंगवॉर... हथियारों की धार तेज... गृह विभाग की धार...

संपादकीय : पुणे में गैंगवॉर… हथियारों की धार तेज… गृह विभाग की धार कुंद

पुणे ने अब डरना और कांपना बंद कर दिया है। हाल के दिनों में पुणे में इतनी आपराधिक घटनाएं हुई हैं कि पुणेकर (पुणेवासी) ‘हत्या’, ‘झगड़ा’, ‘गैंगवॉर’, ‘कोयता गैंग’ आदि शब्दों से अभ्यस्त हो गए हैं। एक घटना से वे सुन्न होकर संभलते ही हैं कि पुणे में एक और चौंकानेवाली घटना घट जाती है। पुणे क्षेत्र में बढ़ती अपराध दर को देखते हुए फिल्मों के रोमांचक दृश्य भी फीके पड़ जाएंगे। शनिवार को दिनदहाड़े कोंढवा में २२-२३ साल के लड़कों ने गणेश काले की बेरहमी से हत्या कर दी। हत्यारों ने पहले उसे पिस्तौल से गोली मारी और फिर सिर और चेहरे पर दरांती से वार कर उसकी हत्या कर दी। यह हत्या पुणे के बहुचर्चित आंदेकर और कोमकर के बीच गैंगवॉर के चलते हुई । एक साल पहले पूर्व नगरसेवक वनराज आंदेकर की हत्या के बाद से दोनों गिरोह बदले की भावना से उत्पात मचा रहे हैं और पुणे में भी वैसा ही गैंगवॉर छिड़ गया है जैसा कभी मुंबई में हुआ था। शनिवार को मारा गया गणेश काले, वनराज आंदेकर की हत्या के आरोपी समीर काले का भाई है। रिक्शाचालक गणेश कोंढवा के बेहद व्यस्त खडी मशीन चौक पर एक पेट्रोल पंप के पास खड़ा था। चौक में भारी भीड़ होने के बावजूद, गैंग से आए हमलावर जरा भी नहीं हिचकिचाए। इसे कहते हैं पुणे पुलिस का ‘रौब’! गैंगवॉर में खूनी खेल की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले, गुंडों ने वनराज आंदेकर की हत्या का बदला लेने के लिए एक कॉलेज छात्र आयुष कोमकर की हत्या कर दी थी। गणपति मूर्ति विसर्जन की पूर्व संध्या पर आंदेकर की हत्या के आरोपी गणेश कोमकर के बेटे आयुष की भी नाना पेठ जैसे भीड़भाड़ वाले इलाके में इसी तरह गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने तब कहा था कि गैंगवॉर के चलते
बदला लेने के लिए
आयुष की हत्या हुई और अब पुलिस को गणेश काले हत्याकांड में भी गैंगवॉर का शक है। अगर पुणे में गुंडों के गिरोहों का बोलबाला है, तो पुलिस क्या कर रही है? नाना पेठ में कोमकर के घर के सामने डीजे पर जोर-जोर से एक खास गाना बजाया गया और आयुष को गोली मार दी गई। यह हत्याकांड दर्शाता है कि पुणे की पुलिस व्यवस्था कितनी निष्प्रभावी और लाचार हो गई है। पुलिस सिर्फ यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकती कि ये घटनाएं आपराधिक गिरोहों के बीच दुश्मनी के कारण हो रही हैं। पिछले ११ महीनों में पुणे में गोलीबारी की १४ घटनाएं हो चुकी हैं। जिस तरह से मानसून में छाते को निकाला जाता है, इस तरह उतनी ही आसानी से कोयता (दरांती) निकाला जा रहा है खुलेआम सड़कों पर। कोथरूड में एक मंत्री के करीबी कार्यकर्ता को दोपहिया वाहन रोकने पर एक गिरोह द्वारा पीटा जाता है। गाड़ी को रास्ता न देने पर गुस्से में कुख्यात गैंगस्टर नीलेश घायवल का गिरोह एक युवक पर ताबड़तोड़ गोलियां चला देता है। कभी शांत और सभ्य शहर कहे जानेवाले पुणे में कोयता गिरोहों की यह गुंडागर्दी और आतंक राज्य के गृह विभाग के लिए कलंक है। अब न सिर्फ गाड़ी चलाते हुए, बल्कि पैदल चलते हुए भी लोग दहशत में हैं। लोगों को डर है कि अगर किसी को गलती से धक्का भी लग गया तो कोई अचानक कोयता (दरांती) निकालकर उनके सिर पर वार कर देगा। उपनगरों के कई इलाकों में दहशत फैलाने के लिए गिरोह सड़कों पर कोयता नचाते घूमते हैं। सोसायटियों के परिसरों में दोपहिया वाहन जला दिए जाते हैं तो कोई नहीं जानता कि कब किस अमीर पिता के लाड़ले बेटे की पोर्श कार दोपहिया वाहन को कुचलते हुए निकल जाए। पुणे में महिलाओं पर अत्याचार भी बढ़ने लगे हैं। स्वार गेट एसटी डिपो पर युवती पर अत्याचार, दिवे घाट पर सामूहिक बलात्कार, कोंढवा में युवती पर अत्याचार जनभावना
को आक्रोशित करने
वाले थे। पुणे जहां एक ओर गैंगवॉर और सामूहिक बलात्कार की घटनाओं से दहल रहा है, वहीं शहर में आतंकवादियों के मिलने की घटनाएं भी हो रही हैं। कभी सामाजिक आंदोलनों का केंद्र रहे पुणे में सार्वजनिक माहौल इतना भयावह क्यों हो गया है? आपराधिक प्रवृत्तियां इतनी बेखौफ क्यों हो गई हैं? पुणे के पालक मंत्री अजीत पवार हमेशा सार्वजनिक भाषणों में पुलिस को चेतावनी देते हैं कि अपराधियों को टायर में डालकर सीधा करो तो वह टायर अभी भी पुलिस को मिला नहीं या गृह मंत्रालय मुख्यमंत्री फडणवीस के पास होने के चलते अजीत दादा का टायर पंक्चर होता ही रहता है यह देव और ‘देवाभाऊ’ जानें! पुणे के जनप्रतिनिधियों-राजनेताओं और डॉन कहे जानेवाले अपराधियों-की मेल-मुलाकात और उनका खुला अभिनंदन पुणेवासियों को देखने को मिलता है। अपराधियों को सम्मानित करके पुणे के प्रशासक कौन-सा सामाजिक हित साधना चाहते हैं? यह प्रश्न उठता है। पुणे के राजनीतिक नेताओं की आपराधिक गिरोहों से यह निकटता चौराहों पर लगे होर्डिंग्स के जरिए भी दिखाई देती है। जब शासक स्वयं अपराधियों से इतने घिरे हुए हैं तो पुलिस और गृह विभाग अपराधियों पर कड़ी नजर वैâसे रख सकते हैं? अगर पुणे में पुलिसिंग की इज्जत बचाए रखनी है तो नाकेबंदी जैसे अस्थायी उपाय काम नहीं आएंगे। पुलिस को राजनीतिक दबाव के खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे। पुणे में अपराध की गहरी जानकारी रखनेवाले अधिकारियों को सक्रिय करना होगा। पुलिस बल में ढिलाई ने न केवल पुणे में, बल्कि राज्य में भी अपराधियों के हौसले बढ़ा दिए हैं। यह अच्छी व्यवस्था का संकेत नहीं है। आंदेकर और कोमकर के बीच गैंगवॉर ने पुणे में हत्याओं का सिलसिला शुरू कर दिया है। भले ही दोनों गिरोहों के अधिकांश गुंडे मकोका के तहत जेल में हैं, फिर भी पुणे की सड़कों पर दिन-दहाड़े हत्याएं हो रही हैं। सांस्कृतिक पुणे में विकृतियां बढ़ रही हैं। पुणे, जो एक ‘आईटी हब’ था, अब एक ‘मर्डर हब’ बन गया है। ‘गैंगवॉर’ के चलते हत्या कर रहे गुंडों की दरांतियों की धार जहां तेज हो गई है, वहीं गृह विभाग और पुलिस की धार कुंद हो गई है। गणेश काले की नृशंस हत्या ने यह साबित कर दिया है!

अन्य समाचार