मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : जो सो गया वो हार गया!

संपादकीय : जो सो गया वो हार गया!

संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन की याद दिलानेवाला एक महा मोर्चा शनिवार को मुंबई की सड़कों पर निकला। यह मोर्चा लोकतंत्र के लिए आराधना थी। इसे जनशक्ति का आक्रोश क्या होता है? और अगर उस आक्रोश को चिंगारी लग जाए तो क्या होगा? इसका रिहर्सल कहने में कोई आपत्ति नहीं है। १५० साल के स्वतंत्रता संग्राम के बाद आम जनता को अपना शासक चुनने का अधिकार, वोट का अधिकार मिला है और वह वोट का अधिकार जब तक चांद-सूरज रहेगा तब तक मिलेगा या नहीं, यही इस महा मोर्चा की चिंता है। कल के मोर्चा ने मतदाताओं में विश्वास पैदा किया। अगर सब एकजुट हो जाएं तो हम वोट चुरानेवालों को परास्त कर सकते हैं और इसके लिए चिंगारी अब लग चुकी है। भाजपा और उसके सहयोगी वोट चुराकर जीते हैं। हमारे लोकतंत्र में इस वोट चोरी को मान्यता नहीं है। भाजपा के लोग खुद को अति सयाना समझते हैं। जब कदमों में पैसों की वर्षा होती है तो इस तरह के सयानापन के भ्रष्ट तरीके सूझते हैं, लेकिन ऐसा करते समय दूसरों को मूर्ख समझना ‘बेवकूफी ‘ है। इसी वजह से भाजपा की जीत की कुंडली खुलने लगी है। ईवीएम से लेकर मतदाता सूची घोटाले तक, इन मंडलियों की करतूतें हैं। चुनाव आयोग इस घोटाले में उनका साथ दे रहा है, जो सबसे गंभीर मसला है। वाकई, भाजपा की मूर्खता भी कमाल की ही है। चुनाव आयोग के खिलाफ सत्य का मोर्चा निकाला गया। चुनाव आयोग को विपक्ष की शंकाओं का समाधान करना चाहिए था, लेकिन भाजपा ने चुनाव आयोग के घोटालों का समर्थन करने के लिए मुंबई में मौन मोर्चा निकाला। भाजपा टोली के इस आंदोलन का क्या मतलब निकाला जाए? वोट चोरी के विरोध में निकाले गए आंदोलन का विरोध करने का सीधा सा मतलब
लोकतंत्र की खुलेआम हत्या
और यह वोट चोरी का समर्थन करने जैसा है। कल के मोर्चे का संदेश यही था कि ऐसे वोट चोरों को सड़कों पर फटकार दो और लोकतंत्र का चीरहरण रोको। मुंबई के एक मंत्री, मंगल प्रभात लोढ़ा ने कल के मोर्चे के बाबत कहा, ‘आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में हार के डर से महाविकास आघाड़ी के नेता एक बार फिर लोकसभा की तरह झूठा प्रचार करने की साजिश रच रहे हैं।’ लोढ़ा जी, आप किस मूर्खता के नंदनवन में जी रहे हैं? आपकी दुनिया मराठी लोगों की छातियों में बने लोढ़ा टावर्स ही हैं? वोट चोरी हो रही है, फर्जी मतदान हो रहा है यह शिकायत भाजपा और आपके सहयोगियों ने सार्वजनिक रूप से की है। मुंह पर काली पट्टी बांधकर किए गए फुटकर आंदोलन से सच्चाई नहीं दबेगी। विराट मोर्चा को ‘नौटंकी’ करार देना लोकतंत्र और मराठी लोगों का अपमान है। लोढ़ा जी, कल के मोर्चा में शामिल लोग आपकी तरह दिहाड़ी पर नहीं लाए गए थे। वे चिलचिलाती धूप में चल रहे थे। वे अंत तक बैठे रहे। आपके प्रधानमंत्री को भी यह नसीब नहीं होता। तो अब से, बस संभलकर जुबां खोलने की चेतावनी ही आपके लिए काफी है। आपके टावरों तक पहुंचने में वक्त नहीं लगेगा? ‘लाडली बहन’ योजना चुनाव में वोट खरीदने का एक घोटाला था। अब बिहार चुनाव में मोदी ने फिर वही पत्ता फेंका है और चुनाव आयोग ने इसे ‘मम’ कह दिया है। बिहार में चुनाव आचार संहिता लग गई है। इस बीच, सरकारी योजना के दस हजार रुपए महिलाओं के खातों में ट्रांसफर कर दिए गए। इतना ही नहीं, पहले चरण के मतदान के बाद भी अगले हफ्ते पैसे ट्रांसफर किए जाएंगे और
‘वोट खरीदने’ की
इस प्रक्रिया को हमारे केंद्रीय चुनाव आयोग ने मान्यता दी है। इसका मतलब है कि लोकतंत्र की रक्षा करनेवाले बाड़ ही खेत को खा रहे हैं। चुनाव आयोग और व्यवस्था बिक चुकी है। ऐसे माहौल में स्वच्छ चुनाव वैâसे हो सकते हैं? चुनाव घोटाले के सूत्रधार दिल्ली में बैठे हैं इसलिए ‘वोट चुरानेवालों को फटकारो’ का नया स्वतंत्रता आंदोलन दिल्ली से शुरू होना चाहिए। मुंबई में उद्धव ठाकरे के नाम से एक बोगस आवेदन दायर किया गया था। कल के मोर्चे में कांग्रेस, शिवसेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और वामपंथी दलों ने भाग लिया। कांग्रेस ने लंबे समय तक देश पर शासन किया। कांग्रेस ने कई अपराध किए होंगे। उन्हें इसकी सजा भी मिली। लेकिन उन्होंने देश की स्वतंत्रता, संप्रभुता बनाए रखी। चुनाव प्रणाली में हस्तक्षेप व फर्जीवाड़ा करने जैसा पाप उनसे नहीं हुआ। तत्कालीन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली के एक मामूली मामले में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दोषी ठहराने का साहस दिखाया। अब चाहे कोई भी अदालत हो, दहलीजें कमजोर हो गईं हैं, आप भले ही सिर पटक-पटक कर लहूलुहान हो जाएं, लेकिन लोकतंत्र का चीरहरण कोई नहीं रोक रहा। इसलिए अगर ‘नेपाल’ की तरह जनता सड़कों पर उतरी है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। राम मनोहर लोहिया ने कहा था
‘जिंदा कौम पांच साल तक
इंतजार नहीं करती…’
महाराष्ट्र की जनता जिंदा है और अगली डवैâती से पहले सड़कों पर उतर आई है। जनता को अब ऐसे ही रहना होगा, रहना ही होगा। अब से जो सोएगा वो हारेगा, जो जागेगा वो ज् ाीतेगा। जो सड़कों पर लड़ने आएगा, वही जीतेगा। अब चुनाव आयोग को कटघरे में लाना जनता का काम है। इसकी शुरुआत हो चुकी है।

अन्य समाचार