भयंकर अतिवृष्टि से राज्य की खेती और किसानों की तबाही के १५ दिन बीत जाने के बाद, राज्य सरकार की नींद खुली और उसने प्रभावित किसानों के लिए ३१,६२८ करोड़ रुपए के ‘पैकेज’ की घोषणा की। मुख्यमंत्री फडणवीस ने मंगलवार को यह घोषणा करके ऐसा दिखावा किया कि जैसे वे प्रभावित किसानों के लिए बहुत कुछ कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि इस पैकेज से अतिवृष्टि से प्रभावित २९ जिलों के ५५३ तालुकाओं के किसानों को तत्काल मदद मिलेगी और इस मदद की सीमा दो हेक्टेयर से बढ़ाकर तीन हेक्टेयर कर दी गई है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि मौसमी बागवानी के लिए मुआवजा २७,००० रुपए प्रति हेक्टेयर, शुष्क भूमि वाले किसानों के लिए १८,००० रुपए प्रति हेक्टेयर और बागवानी किसानों के लिए ३२,५०० रुपए प्रति हेक्टेयर होगा। मुख्यमंत्री ने कई अन्य आंकड़े भी दिए। यह ‘आंकड़ेबाजी’ आकर्षक लगती है, लेकिन वास्तव में यह सब एक गोलमाल है। मुख्यमंत्री ने स्वयं कहा कि यह सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं कि दिवाली तक किसानों को यह मदद मिल जाए। इसका मतलब साफ है कि इस साल अन्नदाता की दिवाली, तबाह हो चुकी खेती-किसानी, परिवार और गृहस्थी को देखते हुए अंधेरे में ही बीतेगी। अगर सरकार सचमुच किसानों की दिवाली मीठी बनाना चाहती थी, तो उसे इस ‘पैकेज’ की घोषणा पहले करनी चाहिए थी। अभी भी जो पैकेज घोषित हुआ है, वह ‘आंकड़े बड़े, मदद खोटे’ वाला है। असल में, सरकार लफ्फाजी करते हुए दिन निकाल रही है। सवाल यह है कि जिनका खजाना ठन-ठन गोपाल है, वे ३१ हजार ६२८ करोड़ रुपए का इंतजाम कहां से
कैसे और कब
करेंगे? यह पैसा असल में किसानों के हाथों में कब पहुंचेगा? तब तक, उनका और उनके परिवार का गुजारा कैसे चलेगा? दिवाली वैâसे मीठी होगी? किसानों के सामने कई गंभीर सवाल हैं। फडणवीस की ‘आंकड़ेबाजी’ इनमें से किसी भी सवाल का जवाब देने के लिए पर्याप्त नहीं है। सरकार का कहना है कि जिन किसानों की जमीन का कटाव हुआ है, उन्हें ‘नरेगा’ के जरिए ३ लाख रुपए और प्रति हेक्टेयर ४७ हजार रुपए नकद मुआवजा दिया जाएगा। सरकार ने ‘आंकड़े’ तो बड़े-बड़े पेश किए हैं, लेकिन यहां भी स्थिति अलग है। राज्य में ६० हजार एकड़ जमीन का कटाव हो चुका है। कटाव वाली जमीन की बनावट सुधारने के लिए, बांधों में जमा गाद को भरना होगा और यह काम कम से कम अप्रैल तक तो संभव नहीं होगा। तो क्या तब तक किसान यूं ही बैठकर कटाव वाली खेती को देखते रहें? मुख्यमंत्री ने जो तीन लाख का ‘नरेगा’ मुआवजा का आंकड़ा ‘पेश’ किया है, वह असल में किसानों पर कब ‘लागू’ होगा? यह भी एक सवाल है। क्योंकि इस योजना के लिए केंद्र सरकार से कभी भी समय पर धनराशि नहीं मिलती। फिर, पैकेज के ३१,००० करोड़ में से १०,००० करोड़ बुनियादी ढांचे के विकास के लिए दिए जाने हैं। यह प्रभावित किसानों के नाम पर अमीरों की जेबें भरने का एक तरीका हुआ। इन ३१,००० करोड़ में पहले घोषित २,२०० करोड़ भी शामिल हैं। तो यहां भी सरकार ने ‘आंकड़ों का खेल’ खेला है। और फिर, क्या यह सहायता अतिवृष्टि से प्रभावित जिलों में पूरी तरह वितरित कर दी गई है? फिर भी
सर्वत्र आनंद ही आनंद
पसरा है। नांदेड़ जिले के लिए ५६३ करोड़ रुपए की सहायता की घोषणा की गई थी। जिसमें से सरकार अब तक जैसे-तैसे केवल १७३ करोड़ रुपए ही आवंटित कर पाई है। तो कल घोषित ३१,००० करोड़ रुपए किसानों की जेब में कब पहुंचेंगे? क्या यह किसानों की न्यूनतम उत्पादन लागत को कवर करेगा? सोयाबीन जैसी फसल की प्रति एकड़ उत्पादन लागत लगभग १४,००० रुपए है और घोषित सहायता १८,००० रुपए प्रति हेक्टेयर है। अगर हम इस हिसाब से देखें कि एक हेक्टेयर ढाई एकड़ होता है, तो उत्पादन लागत लगभग ३५,००० रुपए होती है और सरकारी सहायता १८,००० रुपए है, जो आधी भी नहीं है। अगर हम मुख्यमंत्री के इस दावे को मान भी लें कि कोई भी १०० प्रतिशत मुआवजा नहीं दे सकता, तो भी नुकसान का केवल ३०-४० प्रतिशत की सहायता एक क्रूर मजाक है। राज्य सरकार का ३१,६२८ करोड़ रुपए का पैकेज ‘नाम बड़े और दरसन छोटे’ जैसा है। सरकार ये ३१,००० करोड़ रुपए वैâसे और कब जुटाएगी? ये असल में किसानों के हाथ में कब आएंगे? ‘लाडली बहन’ योजना की तरह, इस पैकेज से और कौन-सी कल्याणकारी योजनाएं प्रभावित होंगी? केंद्र सरकार से मिलने वाली आर्थिक मदद का क्या होगा? राज्य के सत्ताधारी नेता इन सवालों के बाबत क्यों मुंह में दही जमाए बैठे हैं? और कर्जमाफी का क्या? ऐसे कई सवाल हैं, जिनमें से एक भी सवाल का जवाब राज्य सरकार का ये ‘गोलमाल’ पैकेज नहीं देता। हुक्मरान आंकड़ों का ‘खेल’ खेल रहे हैं और उस खेल में, पहले से ही अतिवृष्टि का तांडव झेल चुका अन्नदाता अपनी जिंदगी गवां रहा है। पैकेज के नाम पर अन्नदाता का क्रूर मजाक उड़ाने वाली इस सरकार की जितनी निंदा की जाए कम है!
