राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच विवाद हमारे लिए कोई नई बात नहीं है। खासतौर पर, मोदी राज में हमने बार-बार देखा है कि वैâसे राज्यपाल विपक्षी दलों की राज्य सरकारों के खिलाफ सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक मोहरे की तरह काम करते हैं। राज्यपाल के पद का व्यापक रूप से दुरुपयोग विपक्षी दलों की सरकारों के लिए हर तरफ से दुविधा पैदा करने के लिए किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ महीने पहले सत्ता के इस मनमानेपन पर रोक लगा दी थी। न्यायालय ने एक समय सीमा तय की थी कि राज्यपाल विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को अधिकतम तीन महीने के भीतर मंजूरी दें इसलिए यह सोचा जा रहा था कि राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच कम से कम एक टकराव तो खत्म हो जाएगा। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने अपने नवीनतम पैâसले में खुद स्पष्ट किया है कि राज्यपाल-राष्ट्रपति पर समय सीमा नहीं थोपी जा सकती। मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को यह पैâसला सुनाया। पीठ ने अपने नवीनतम पैâसले में स्पष्ट किया है कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चित काल तक नहीं रोक सकते और अदालत अनुचित देरी के मामलों में हस्तक्षेप कर सकती है, लेकिन
अनिश्चित काल का मतलब
कितना होगा, यह कैसे तय होगा? इसका पैâसला कौन करेगा? विपक्षी सरकारों को बाधित करने के लिए इस खामी का फायदा उठाया जा रहा था। जब ऐसा लग रहा था कि यह सब थम गया है तो नए पैâसले के साथ यही खेल फिर से शुरू हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ताजा पैâसले में राज्यपाल के पास विधेयकों को मंजूरी देने के उपलब्ध विकल्पों के बारे में स्पष्ट रुख जरूर अपनाया है। राज्यपाल को विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों को रोकने का अधिकार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प हैं या तो उन्हें मंजूरी दें, अगर कोई आपत्ति हो तो उन्हें पुनर्विचार के लिए विधानमंडल के पास वापस भेजें या उन्हें राष्ट्रपति के पास भेजें। हालांकि, यह पैâसला इस लिहाज से मार्गदर्शक है, लेकिन विपक्षी सरकारों और राज्यपाल के बीच टकराव का मुख्य मुद्दा ‘समय सीमा’ ही है। डर है कि इस पैâसले से यह ‘गले की हड्डी’ यूं ही बनी रहेगी। तमिलनाडु में स्टालिन सरकार द्वारा अनुमोदित दस विधेयकों को वहां के राज्यपाल ने पांच-छह महीने के लिए नहीं, बल्कि दो साल के लिए रोक दिया था। यह जनता द्वारा नियुक्त सरकार के संवैधानिक अधिकारों को सीधा-सीधा
रौंदने जैसा ही
था। इसीलिए स्टालिन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस पर पैâसला सुनाते हुए कोर्ट ने सीधे तौर पर वहां के राज्यपाल की कार्रवाई को अवैध करार दिया था। साथ ही अपने विशेषाधिकार के तहत सभी दस विधेयकों को मंजूरी भी दे दी थी। इसके अलावा, राज्यपाल द्वारा विधेयक को मंजूरी देने के लिए तीन महीने की समयसीमा तय की गई थी। इससे देश में राज्यपाल-पीड़ित विपक्षी दलों की सरकारों ने राहत की सांस ली थी। हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट ने पैâसला दिया है कि समयसीमा राज्यपाल पर लागू नहीं होती इसलिए इस पैâसले का फायदा उठाकर राज्यपाल फिर से अड़चनें पैदा कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को अदालत का दरवाजा खटखटाने का विकल्प दिया है और फैसला सुनाया है कि अदालत मामलों में हस्तक्षेप करेगी। हालांकि, ऐसा करने में लगने वाला समय अंतत: उस राज्य की मूल में आएगा और उस राज्य के लोगों को इसके परिणाम भुगतने होंगे। सुप्रीम कोर्ट के पिछले पैâसले ने राज्यपाल की समयसीमा के घोड़ों को गंगा में बहा दिया था। लेकिन अब डर है कि ये फिर से विपक्षी सरकारों की गर्दन पर सवार हो जाएंगे। इसके अलावा, राज्यपाल के साथ उनका टकराव भी फिर से अटल हो गया है।
