महाराष्ट्र में पड़े सूखे के संदर्भ में मुख्यमंत्री फडणवीस ने एक अच्छा रुख अपनाया है। फडणवीस का कहना है कि सूखे की स्थिति में हर किसी को संवेदनशीलता दिखाकर अनावश्यक खर्चों से बचना चाहिए। मुख्यमंत्री ने शादी-ब्याह, नामकरण और मुंडन जैसे कार्यक्रमों पर फिजूलखर्ची न करने तथा जहां जरूरत हो, वहां आवश्यकता से कम खर्च करने का सुझाव दिया है। इससे होनेवाली बचत सूखे से प्रभावित लोगों के लिए मदद के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है। मुख्यमंत्री फडणवीस ने नागरिकों से न केवल आर्थिक मदद, बल्कि अन्य प्रकार की मदद करने की भी अपील की है। मुख्यमंत्री की यह अपील उनके संवेदनशील मन का प्रतीक है। राज्य पर सूखे का संकट गंभीर है। सूखे के कारण पैदा हुई आर्थिक तंगी की वजह से दो दिनों में चार किसानों ने आत्महत्या कर ली है। परभणी, यवतमाल, सोलापुर और हिंगोली जिलों की ये घटनाएं मुख्यमंत्री तक पहुंची ही होंगी। जाहिर है कि अगर आगे किसानों को मदद नहीं मिली, तो आत्महत्याओं का आंकड़ा बढ़ता जाएगा और सूखा प्रभावित इलाका मरघट बन जाएगा। यह सब रोककर लोगों को बचाने की जिम्मेदारी फडणवीस और उनकी सरकार की है, लेकिन फडणवीस ने जनता से कहा, ‘बचत करो और सूखा पीड़ितों की मदद करो।’ यह कहने के बजाय फडणवीस को यह कहना चाहिए था कि, ‘मंत्रियों, भ्रष्टाचार कम करो। ठेकेदारों से ‘कट’ मत मारो और यह सारा पैसा सूखा पीड़ितों को बचाने के लिए इस्तेमाल करो।’
लोगों से उनकी बचत लेना
यानी दांत कुरेदकर पूंजी जमा करना और सूखा पीड़ितों को देना, ऐसा यह मामला हुआ। इससे क्या हासिल होगा? राज्य की सरकार दलालों और ठेकेदारों की सरकार बन गई है। हर जगह लूट मची है। कोंकण में ९०० करोड़ रुपए के अवैध जमीन सौदे का मामला सामने आया है। शक्तिपीठ मार्ग के लिए संबंधितों के बड़े आर्थिक लेन-देन की चर्चा तो है ही। अनावश्यक काम निकालकर ठेकेदारों के लिए खजाना खाली करना और अपनी जेबें गर्म करना। यह लूट मुख्यमंत्री रोक भी दें, तो भी सूखा पीड़ितों का भला होगा। महाराष्ट्र में विपक्षी दलों के सांसदों, विधायकों और नगरसेवकों को खरीदने के लिए ५०-७५ करोड़ रुपए प्रति व्यक्ति खर्च किए जाते हैं। यह पैसा आता कहां से है? यह मंत्रियों द्वारा अनावश्यक खर्चों को टालकर जमा की गई बचत नहीं है। यह सरकारी खजाने की लूट से इकट्ठा किया गया पैसा है। आगे से यह अनावश्यक पैसा और खर्च न करके उसे सूखा पीड़ितों के लिए इस्तेमाल किया जाए, दरअसल ऐसा फरमान मुख्यमंत्री द्वारा जारी किया जाना चाहिए था। पिछले कई चुनावों में वोट खरीदने के लिए फडणवीस और उनके लोग किस खर्च में कटौती करके पैसा लाते हैं? इसके बाद जब तक सूखा खत्म नहीं होता, तब तक मुख्यमंत्री इस अनावश्यक खर्च को काटकर सूखा पीड़ितों की मदद के रूप में दें तो बेहतर होगा। शिवसेना के छह सांसद ७५-७५ करोड़ रुपए में खरीदे गए। उन्हें अब तक १५ से २० करोड़ रुपए मिले और बाकी के ४०-४५ करोड़ रुपए अगले महीने मिलेंगे, ऐसा कहा गया। यह
अगली किस्त मिंधे गुट
सूखा पीड़ितों की मदद के लिए मोड़ दे, ऐसा फडणवीस यदि मिंधे से कहें तो एक ही झटके में करोड़ों रुपए सूखा पीड़ितों के लिए जमा हो जाएंगे। जनता की जेब पहले से ही फटी हुई है। ऊपर से महंगाई और सूखा इस फटी जेब की बची-खुची चिल्लर भी छीन रहे हैं। ऐसे में आम आदमी की जेब से क्या मिलेगा? इसलिए दान-पुण्य की शुरुआत महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री, मंत्रियों और (सरकारी) विधायकों को खुद से करनी चाहिए, तब जाकर एक नया आदर्श स्थापित होगा। क्या मुख्यमंत्री इस दिशा में पहल करेंगे? भाजपा और मिंधे जैसे गुटों के विधायक और सांसद एक महीने का ‘वेतन’ सूखा पीड़ितों को देने का एलान करेंगे। यह ढोंग है। क्या सत्ताधारी विधायक और सांसद सरकार की तनख्वाह पर पलते हैं? उनकी कमाई के ‘सोर्स’ तो समंदर की लहरों की तरह उफान मार रहे हैं। मुंबई के ‘एसआरए’ प्रोजेक्ट के बिल्डरों और इस विभाग के अधिकारियों को भी सूखा राहत कोष में पांच-दस हजार करोड़ का दान डालने का निर्देश दिया जाना चाहिए। पीएम केयर्स फंड में १० हजार करोड़ रुपए पड़े हुए हैं। उसमें से दो-चार हजार करोड़ रुपए सरकार महाराष्ट्र के सूखा पीड़ितों के लिए ट्रांसफर करे और किसानों का पक्ष ले, यह नम्र निवेदन है। सूखे के कारण महाराष्ट्र संकट में है। राज्य की ११ करोड़ जनता फूल नहीं तो फूल की पंखुड़ी देगी ही, लेकिन उससे क्या होगा? सरकारी मंत्रियों, अधिकारियों और ठेकेदारों के दरवाजों पर पैसे के पेड़ लहलहा रहे हैं। उन्हें हिलाने की हिम्मत मुख्यमंत्री को दिखानी चाहिए। दांत कुरेदकर मिलनेवाले दान से सूखे का निवारण कैसे होगा?
