पेट्रोलों के बढ़ गए, देखो फिर अब भाव,
महंगाई की मार से डगमग सबकी नाव।।
ट्रैक्टर, बस, ट्रक सभी माँग रहे हैं दाम,
डीज़ल महँगा हो गया, ठप पड़े हैं काम।
पहुंच रसोई तक गया तेलों वाला दाव—
महंगाई की मार से डगमग सबकी नाव।।
सब्ज़ी, दूध, अनाज सब पहुंचे ऊंचे भाव,
मध्यमवर्गी आदमी खो बैठा सब चाव।
जेबें खाली हो रहीं, बढ़ता रोज दबाव—
महंगाई की मार से डगमग सबकी नाव।।
रहा विदेशी तेल पर निर्भर अपना देश,
युद्धों और तनाव का जनता भुगते क्लेश।
ऊर्जा की राजनीति करती गहरे घाव—
महँगाई की मार से डगमग सबकी नाव।।
मेट्रो, बस, परिवहन को करना अब मज़बूत,
बिजली वाले वाहन से बदले जीवन-सूत।
सौर ऊर्जा ही दे सके भविष्य को ठहराव—
महँगाई की मार से डगमग सबकी नाव।।
‘सौरभ’, केवल दोष से हल होंगे न रोग,
नीति और जनचेतना दोनों बनें सुयोग।
संतुलित विकास से हो सकता बचाव—
महँगाई की मार से डगमग सबकी नाव।।
-डॉ. प्रियंका सौरभ
