सुनील ओसवाल / मुंबई
मंत्रालय से सामने आई एक घटना ने फडणवीस सरकार के प्रशासनिक दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सरकार की ओर से मंत्रालय में १० हजार रुपए से अधिक नकद लेकर आने पर सख्त पाबंदी होने की बावजूद शिंदे गुट के एक मंत्री के केबिन से सीधे ८० हजार रुपए चोरी होने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि जब नियम इतने सख्त हैं तो मंत्री कार्यालय तक इतनी बड़ी नकद रकम पहुंची कैसे? क्या मंत्रालय के नियम सिर्फ आम कर्मचारियों और जनता के लिए हैं, जबकि सत्ता के गलियारों में अलग व्यवस्था चलती है?
सूत्रों के मुताबिक, पैसे गायब होने की जानकारी मिलते ही मंत्रालय में अफरातफरी का माहौल बन गया। देर रात तक कर्मचारियों, कंत्राटी स्टाफ और विभिन्न विभागों में आने-जाने वालों से पूछताछ की गई। कई लोगों की तलाशी भी लिए जाने की चर्चा है। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अब तक इस मामले में कोई आधिकारिक पुलिस शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। यही कारण है कि मंत्रालय के भीतर अब यह चर्चा तेज हो गई है कि मामला केवल चोरी का नहीं, बल्कि ‘वैâश एंट्री’ उजागर होने के डर से दबाया जा रहा है। अगर रकम वैध थी तो शिकायत दर्ज कराने में हिचकिचाहट क्यों? और अगर नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।
नियमों से कई गुना ज्यादा नकदी कैसे पहुंची?
सवाल उठ रहे हैं कि जिस मंत्रालय से भ्रष्टाचार रोकने और पारदर्शिता की बातें की जाती हैं, वहीं मंत्री के केबिन में नियमों से कई गुना ज्यादा नकदी कैसे पहुंची?
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह मामला सिर्फ ८० हजार रुपए की चोरी नहीं, बल्कि सत्ता और सिस्टम के भीतर चल रही नकद संस्कृति की झलक है।
अब देखना होगा कि सरकार इस पर पारदर्शी जवाब देती है या मामला हमेशा की तरह फाइलों में दबा दिया जाएगा।
