संपत्ति की भूख में टूटे घर-परिवार,
मन के मंदिर ढह गए, बचा नहीं आधार।।
कल तक मिलकर खेत थे, बाँट रहे थे छाँव,
आज ज़मीनी रेख ने जला दिए सब गाँव।
भाई-भाई लड़ पड़े, भूले सारा प्यार—
मन के मंदिर ढह गए, बचा नहीं आधार।।
मां की आंखें रो पड़ीं, बिखरा सारा मान,
आंगन में दीवार ने बांटे सब अरमान।
धन की अंधी चाह में टूटा घर-संसार—
मन के मंदिर ढह गए, बचा नहीं आधार।।
सोने-चांदी से नहीं मिलता मन का चैन,
रिश्तों वाली छांव में सुख से बीते रैन।
मिट्टी खातिर हो गए कितने लोग बीमार—
मन के मंदिर ढह गए, बचा नहीं आधार।।
‘सौरभ’, रिश्ते ही सदा जीवन का आधार,
धन-दौलत सब रह गई, खाली हाथ पसार।
प्रेम बचाना सीख लो, यही सही संस्कार—
मन के मंदिर ढह गए, बचा नहीं आधार।।
-डॉ. सत्यवान सौरभ
