-पंद्रह मौतों को केवल दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना कहकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही की सामूहिक विफलता है। इस बार जांच का परिणाम निलंबन और बहाली के पुराने खेल तक सीमित रहा तो अगला अग्निकांड केवल समय और स्थान का प्रश्न होगा।
सामना संवाददाता / लखनऊ
लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड ने एक बार फिर सरकारी निरीक्षणों, अग्निसुरक्षा अभियानों और जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। हादसे में १५ लोगों की मौत हो चुकी है। मृतकों में अधिकतर युवा बताए जा रहे हैं, जो बेहतर भविष्य का सपना लेकर प्रशिक्षण केंद्र पहुंचे थे। उन्हें क्या पता था कि जिस इमारत में वे पढ़ने जा रहे हैं, वहां आग लगने की स्थिति में सुरक्षित बाहर निकलने का रास्ता भी शायद उपलब्ध नहीं होगा। अलीगंज थाने में इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं और उत्तर प्रदेश अग्निशमन सेवा अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस ने अब तक तीन लोगों को गिरफ्तार किया है।
बताया जा रहा है कि इस बिल्डिंग के लिए फायर एनओसी भी नहीं लिया गया था। नियमों के मुताबिक, जो बिल्डिंग १५ मीटर से कम ऊंची और ५०० वर्ग मीटर से कम हो उसके लिए फायर का एनओसी लेना आवश्यक नहीं है। अगर इमारत में फायर सेफ्टी के इंतजाम होते तो समय रहते आग पर काबू पाया जा सकता था। लखनऊ अग्निकांड में सीएम योगी के आदेश पर लापरवाही बरतने के आरोप में चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। पुलिस ने इमारत के मालिकों समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए लोगों में राम कृष्ण उपाध्याय (४३), वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला (६२), तुषार कृष्ण जायसवाल (३१) और सुरेश कुमार साहू शामिल हैं। उपाध्याय, शुक्ला और जायसवाल आग की जद में आयी इमारत के संयुक्त रूप से मालिक थे। बताया गया कि अचानक आग भड़कने के बाद प्रशिक्षण केंद्र में मौजूद लोग पीछे की ओर भागे, लेकिन वहां धुआं भर जाने के कारण कई लोग बाहर नहीं निकल सके। कुछ लोगों ने जान बचाने के लिए खिड़कियों से छलांग लगाई। यह दृश्य निस्संदेह विचलित करने वाला है, लेकिन उससे भी अधिक पीड़ादायक प्रश्न यह है कि ऐसे हादसे बार-बार क्यों होते हैं?
हर त्रासदी के बाद वही कहानी
दिल्ली में अग्निकांड होने के बाद लखनऊ में होटल, कोचिंग संस्थान और व्यावसायिक भवनों के निरीक्षण किए जाते हैं। अधिकारी दल-बल के साथ पहुंचते हैं, नोटिस जारी होते हैं और कार्रवाई के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। कुछ दिनों तक समाचार पत्रों में तस्वीरें छपती हैं, फिर अभियान ठंड पड़ जाता है। अवैध निर्माण और अग्निसुरक्षा नियमों का उल्लंघन पहले की तरह चलता रहता है।
जांच पूरी होने के बाद क्या?
यही कारण है कि आज लोगों को एसआईटी के गठन मात्र से भरोसा नहीं हो रहा। जनता पूछ रही है कि जांच पूरी होने के बाद क्या होगा? क्या केवल छोटे कर्मचारियों को निलंबित कर औपचारिकता पूरी कर दी जाएगी? क्या भवन स्वामी, संस्थान संचालक और अनुमति देने वाले अधिकारियों की समान जिम्मेदारी तय होगी? क्या अवैध निर्माण को संरक्षण देने वाले वरिष्ठ अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों तक जांच पहुंचेगी? पुरानी फाइलें खोजना जरूरी है, लेकिन वर्तमान में हो रहे अवैध निर्माण रोकना उससे भी अधिक आवश्यक है। प्रत्येक व्यावसायिक भवन, कोचिंग संस्थान, अस्पताल, होटल और प्रशिक्षण केंद्र का डिजिटल अग्निसुरक्षा रिकॉर्ड बनाया जाना चाहिए।
एग्जिट के लिए दूसरा रास्ता होता तो बच जाती मासूम जानें
इमारत में आग लगने के बाद लोग जान बचाने की गुहार लगा रहे थे। अंदर से चीखने की आवाजें आ रही थीं लेकिन, रेस्क्यू ऑपरेशन में काफी दिक्कतें आ रही थीं। इसकी सबसे बड़ी वजह थी, बिल्डिंग की डिजाइन में खामी। इमारत में बाहर आने-जाने का केवल एक ही रास्ता था। हादसे के चश्मदीदों का कहना है कि अगर एग्जिट का दूसरा रास्ता होता तो लोगों की जान बच सकती थी।
हादसों से नहीं सीखता सिस्टम
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अलीगंज अग्निकांड की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित किया है। अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात और एडीजी लखनऊ जोन प्रवीण कुमार को विस्तृत जांच की जिम्मेदारी दी गई है। एसआईटी यह पता लगाएगी कि आग वैâसे लगी, भवन का स्वीकृत उपयोग क्या था, उसमें संचालित प्रतिष्ठानों के पास आवश्यक अनुमति थी या नहीं और अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र लिया गया था या नहीं। लेकिन लखनऊ पहले भी ऐसी जांच देख चुका है। वर्ष २०१८ में नाका क्षेत्र के होटल विराज और एसएसजे इंटरनेशनल में लगी आग में छह लोगों की मौत हुई थी। उस समय भी जांच बैठी, अधिकारियों की लापरवाही सामने आई और निलंबन किए गए। आरोप है कि बाद में अधिकतर अधिकारी बहाल हो गए और व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट आई। जांच रिपोर्ट में एलडीए, पुलिस और अन्य विभागों को जिम्मेदार ठहराए जाने के बावजूद ऐसा उदाहरण स्थापित नहीं हुआ, जिससे भविष्य में अधिकारी नियमों की अनदेखी करने से डरते।
