-अटलांटिक में दो लाख पीपों में फेंका गया था रेडियोधर्मी कचरा
-वैज्ञानिकों ने शुरू किया पीपों का तलाशी अभियान
-१६,००० फुट की गहराई में पड़े हैं पीपे
सामना संवाददाता / मुंबई
अटलांटिक महासागर की गहराइयों में दशकों पहले फेंके गए दो लाख से अधिक रेडियोधर्मी कचरे के पीपों की खोज के लिए एक बड़े वैज्ञानिक अभियान की शुरुआत की गई है। इनमें समुद्र तल की मिट्टी के नमूने और गहरे समुद्र में रहने वाली मछलियों के ऊतकों के नमूने शामिल हैं। इनकी जांच के आधार पर पूरे क्षेत्र में रेडियोधर्मी प्रभाव का आकलन किया जाएगा। अगर मछलियों में रेडियोधर्मी तत्वों का प्रवेश हुआ होगा तो इन मछलियों को खानेवाले व्यक्ति की जान भी जा सकती है।
बता दें कि वर्ष १९४६ से १९९० के बीच यूरोप के १४ देशों ने दो लाख से अधिक रेडियोधर्मी कचरे से भरे पीपे अटलांटिक महासागर में डाले थे। इन पीपों को कंक्रीट और डामर जैसी सामग्री से तैयार किया गया था, ताकि कचरे को लगभग २० वर्षों तक सुरक्षित रूप से अलग रखा जा सके। हालांकि, अब इन सभी पीपों की निर्धारित सुरक्षित अवधि समाप्त हो चुकी है।
१६ हजार फुट की गहराई
इन पीपों में निम्न और मध्यम स्तर का रेडियोधर्मी कचरा भरा हुआ है। इसमें औद्योगिक अवशेष, दूषित धातु और प्रयोगशालाओं में उपयोग किए गए उपकरण शामिल हैं। यह कचरा अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में लगभग तीन हजार से पांच हजार मीटर यानी करीब दस हजार से सोलह हजार फुट की गहराई में पड़ा हुआ है।
२०२५ में शुरू हुआ पहला चरण
इस खोज अभियान का पहला चरण वर्ष २०२५ की गर्मियों में शुरू किया गया। इस अभियान का नेतृत्व प्रâांस के राष्ट्रीय वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र और समुद्री अनुसंधान संस्थान कर रहे हैं। अभियान के तहत वैज्ञानिकों ने प्रâांस के तट से लगभग ६५० किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्वी अटलांटिक महासागर के अत्यंत गहरे समुद्री क्षेत्र का २६ दिनों तक सर्वेक्षण किया।
