मनोज वार्ष्णेय
देश की राजधानी दिल्ली में लाल किले के सामने हुआ कार विस्फोट, आतंकियों द्वारा एक योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया विस्फोट है। ठीक उसी तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से शांति के नोबेल के लिए तैयारी आरंभ कर दी है। उनके भारत के प्रति हाल के दिनों में दिए गए बयान, रूसी राष्ट्रपति की तय भारत यात्रा, नोबेल प्राइज के लिए नामांकन का काम आरंभ और फीफा वर्ल्ड कप का शांति के लिए पुरस्कार देने की घोषणा करना, ये कुछ ऐसे घटनाक्रम हैं, जिनसे लगता है कि डोनाल्ड ट्रंप ने तय कर लिया है कि वर्ष २०२६ का शांति का नोबेल पुरस्कार हर हाल में जीतकर ही रहेंगे। यह लगातार दूसरी बार होगा, जब वह इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाकर खुद को शांति का मसीहा घोषित करना चाहते हैं।
खा गए मात!
वर्ष २०२५ में वह हर प्रकार की कोशिश के बाद भी नोबेल पीस प्राइज नहीं जीत सके थे। माना जा रहा है कि इसके पीछे भारत का समर्थन, घोषित तौर पर नहीं मिलना बड़ा कारण रहा, यह कारण बेवजह भी नहीं था। ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को भारत ने जिस तरह से सुलटाया था, उसे देखकर ट्रंप ने यह कहकर श्रेय लेने का प्रयास किया कि उन्होंने दोनों की लड़ाई बंद कराई। जबकि इसके विपरीत देखें तो भारत ने हमेशा इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा। हां, यह जरूर कहा कि पाकिस्तान को उसी के गढ़ में हमारे जवानों ने धो दिया। इससे चिढ़कर ही ट्रंप ने रूसी तेल की आड़ में ‘जजिया कर’ जैसा टैरिफ लगा दिया। उन्हें उम्मीद थी कि इससे भारत, डरपोक पाकिस्तान की तरह आत्मसमर्पण कर देगा। मगर हुआ उल्टा। अब जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ६ दिसंबर २०२५ को भारत आ रहे हैं, तो खुद ट्रंप ने भारत और उसकी जनता की तारीफ करनी आरंभ कर दी है।
ट्रंप के दो बयान इस बात की गवाही दे रहे हैं कि वह समझौता करने को बेताब हैं और किसी भी कीमत पर भारत की मदद चाहते हैं। ट्रंप ने कहा कि भारत की जनता उनसे प्यार नहीं करती है, पर जल्दी ही वह उनसे प्यार करने लगेगी। उन्होंने भारत पर लगे टैरिफ को भी घटाने की बात कही। उनका दूसरा बयान है कि उनके देश में हर प्रकार की प्रतिभा नहीं है, इसलिए उन्हें दूसरे देशों से लाना होगा। इसका सीधा सा मतलब है कि अब ट्रंप न सिर्फ टैरिफ कम करने की सोच रहे हैं, बल्कि वह एच-१ बी वीजा फीस में जो अनाप-शनाप बढ़ोतरी हुई है, उसे भी कम करेंगे। यहां यह बात सभी जानते हैं कि भारतीयों जैसी प्रतिभाएं किसी दूसरे देश में नहीं हैं। इसका मतलब यह है कि अब वह भारतीय यूथ को भी लुभाने के लिए कदम उठाएंगे। प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों? दरअसल, ट्रंप देख चुके हैं कि वह कितनी भी कोशिश कर लें, पर उनकी सुनवाई नहीं हो रही। उनसे डरना तो दूर कोई घबरा भी नहीं रहा। यहां तक कि उनके यहां जो लोग रोजगार लेकर गए थे, वह भी वापस होने लगे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने डराकर अपना मतलब निकालने की सोचा था, पर वह उसमें मात खा गए। पाकिस्तान जैसे देश उनसे डरते हैं और ट्रंप जानते हैं कि उनका दुनिया में कोई कीमत नहीं है।
मनाने में लगे
ट्रंप के इन निर्णयों के पीछे जो सबसे बड़ी बात है वह यह है कि वह नोबेल के लिए भारत की अनुशंसा चाहते हैं क्योंकि वह उन्हें मिल नहीं रही। वह जब भी भारत से कोई समझौता करना चाहते हैं या फिर खुद का रवैया लचीला दिखाते हैं तो उनका गुलाम जैसा दोस्त पाकिस्तान, भारत में आतंकवादी हरकतें करवा देता है। यहां यह बात भी ध्यान रखनी होगी कि ट्रंप का सपना नोबेल के लिए है और अब नामांकन का समय आरंभ हो गया है, यह हर हाल में जनवरी के अंत तक पूरा हो जाएगा। अब तक ट्रंप को जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची और पाकिस्तान ने नोबेल के लिए नामांकित कर दिया है। उनके सामने इस पुरस्कार को पाने के लिए प्रâांसेस्का अल्बानीज को नामांकन मिला है और यह उन्हें नामांकन दो ऐसे संगठनों ने दिया है, जो नागरिक समाज कार्य तथा महिला सुरक्षा के लिए कार्य करते हैं। अल्बानीज जहां मानवीयता की बात करती हैं, वहीं ट्रंप हमेशा व्यापार के लिए लाभदायक सौदों की तलाश में रहते हैं। ट्रंप की धमकियां हर कहीं उत्तेजना का कार्य करती हैं और शांति कभी उत्तेजना से नहीं आती। अभी तो नामांकन का दौर आरंभ ही हुआ है और ट्रंप के लिए चुनौतियां सामने आने लगी हैं। यह बात भी उन्हें सालती होगी कि पाकिस्तान के कुछ नेताओं ने पिछली बार उनके नामांकन पर प्रश्र उठाए थे। इन हालात में वह अब भारत की विश्वसनीयता को समझते हुए अपनी सहृदयता की आड़ में हमें मनाने की कोशिश कर रहे हैं।
ट्रंप को पता है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जब भारत आ रहे हैं, तो वह कुछ न कुछ ऐसा करके जाएंगे, जिससे भारत की दोस्ती और मजबूत होगी। रूसी राष्ट्रपति वर्ष २०२१ में भी दिसंबर माह में भारत आए थे और अब फिर वह समय है। इस बार भारत के व्यापार पर अमेरिका की चोट है, यहां की युवा प्रतिभा को अमेरिका ने अपने यहां आने से रोकने की कोशिश की है और अमेरिका भारत को डराने के लिए पाकिस्तान की सहायता कर रहा है। इन हालात में पुतिन की यात्रा बहुत महत्वपूर्ण है। संभवत: खुद ट्रंप भी अगले वर्ष भारत आने की बात करके कोई माहौल पैदा करना चाहते हों। इधर ट्रंप नोबेल प्राइज देने वाली कमेटी को अपनी नेकनीयती और गुडविल दिखाने के लिए केवल भारत को पटाने का प्रयास कर रहे हों, ऐसा भी नहीं है। उन्होंने फीफा को लेकर भी अपनी बात रखी है। हां, फीफा की ओर से उन्हें कुछ पॉजीटिव संकेत मिल रहे हैं। इसमें लगता है कि फीफा का पहला शांति पुरस्कार उन्हें मिल सकता है। यह भी संभवत: उन्हीं दिनों में दिया जाएगा, जब रूसी राष्ट्रपति पुतिन भारत में होंगे।
नोबेल की आस!
वैसे इस बात में कोई दो राय नहीं हैं कि फीफा के प्रेसिडेंट इनफेंटिनो ट्रंप के दोस्त हैं और दोस्त की मदद करने के लिए वह उन्हें यह पुरस्कार दे भी सकते हैं। ट्रंप को लगता है कि अगर उन्हें यह पुरस्कार मिल गया और वह भारत से खराब हुए संबंधों को सुधारते हुए अपने पक्ष में नामांकन पा जाते हैं, तो हो सकता है कि वह वर्ष २०२६ का शांति का नोबेल भी पा जाएं। मगर ऐसा तभी संभव है, जब भारत यह मानें की ट्रंप के कारण भारत में पाकिस्तान के रवैये में परिवर्तन हुआ है। यूं पाकिस्तान का जन्म ही भारत के नुकसान पर हुआ है और वह भारत को परेशान करने के लिए हर प्रकार से काम करता है, ऐसे में ट्रंप की नोबेल डील कहें या फिर उनकी चुपड़ी बातें, भारत पर बहुत असर नहीं डालने वालीं।
विदेशी मामलों के जानकार यह भी कहते हैं कि ट्रंप के खिलाफ अब बाहर ही नहीं उनके देश में भी माहौल बन रहा है। इस बार अमेरिकी शट-डाउन जितना देर तक चला, उतना पहले कभी नहीं चला था और जिस तरह की परेशानियां इस बार हुईं, इसके पहले नहीं हुई थीं। इससे उनकी किरकिरी हुई है। इससे भी वे कुछ परेशान हैं। कहने की बात कोई भी हो, पर ट्रंप के मन में अभी भी नोबेल की चमक का सागर हिलोरें ले रहा है और वह उसे पाने के लिए अब अपने रवैये को बदलने को भी शायद तैयार हैं, फिलवक्त की उनकी गतिविधियां तो कुछ ऐसी ही हैं।
(लेखक राजस्थान से प्रकाशित नवज्योति के पूर्व साहित्य संपादक हैं)
