– एमडीसीटीएस के तहत ४२ मामले दर्ज
– १०.५० लाख रुपए का जुर्माना वसूला
संदीप पांडेय / मुंबई
मुंबई में कहीं इमारतों का पुनर्विकास, कहीं मेट्रो का काम तो कहीं सड़कों और पुलों का निर्माण। शहर में वर्षों से विकास के नाम पर खुदाई और तोड़-फोड़ का सिलसिला जारी है। इसके साथ उड़ती धूल और निर्माण मलबे से होने वाले प्रदूषण का बोझ भी मुंबईकर उठाते रहे, लेकिन अब मनपा को मलबे की ढुलाई पर डिजिटल निगरानी की जरूरत महसूस हुई है। सवाल उठता है कि जब शहर में निर्माण का जाल तेजी से पैâल रहा था, तब ऐसी व्यवस्था लागू करने के लिए मनपा किसका इंतजार कर रही थी? क्या प्रशासन को आम लोगों की परेशानी तब तक दिखाई नहीं देती, जब तक उस पर कार्रवाई का दबाव न बने?
मनपा के मुंबई डेब्रिस कंट्रोल एंड ट्रैकिंग सिस्टम (एमडीसीटीएस) के तहत १ अप्रैल से १५ अक्टूबर २०२६ के बीच ४२ मामले दर्ज किए गए और करीब १०.५० लाख रुपए का जुर्माना वसूला गया। वहीं पोर्टल पर ४९९ हितधारकों के पंजीकरण की जानकारी सामने आई है। यह कार्रवाई जरूरी है, लेकिन सवाल सिर्फ जुर्माने का नहीं, बल्कि उस देरी का भी है जिसके दौरान मुंबईकर निर्माण की धूल और अव्यवस्थित मलबे की समस्या से जूझते रहे।
मुंबई में रोजाना ८,००० टन से अधिक निर्माण एवं तोड़-फोड़ का कचरा निकलने और प्रसंस्करण क्षमता लगभग १,२०० टन प्रतिदिन होने की जानकारी भी सामने आई है। ऐसे बड़े अंतर के बीच मलबे की निगरानी और वैज्ञानिक निस्तारण की जरूरत और बढ़ जाती है। केवल नियम बनाना काफी नहीं, उनका पालन सुनिश्चित करना भी मनपा की जिम्मेदारी है।
पहले निगरानी क्यों नहीं, अब कार्रवाई क्यों?
निर्माण और तोड़-फोड़ से निकलने वाले मलबे की ढुलाई पर नजर रखना कोई असंभव काम नहीं है। ट्रकों को ढंककर ले जाना, वाहनों में ट्रैकिंग डिवाइस लगाना और मलबे को अधिकृत जगह पर पहुंचाना सुनिश्चित करने जैसे उपाय पहले भी अपनाए जा सकते थे। फिर मनपा ने इस व्यवस्था को प्रभावी बनाने में इतनी देर क्यों की? क्या प्रशासन की प्राथमिकता में मुंबईकरों की साफ हवा और स्वास्थ्य सबसे ऊपर नहीं होना चाहिए था?
