सामना संवाददाता / नासिक
नासिक के एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी से कथित डिजिटल गिरफ्तारी के नाम पर `७१ लाख ठगने का मामला साइबर अपराधियों की मनोवैज्ञानिक चालों को उजागर करता है। पुलिस शिकायत के अनुसार अपराधियों ने खुद को जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर आतंकवाद और धनशोधन के मामले में फंसाने की धमकी दी। पीड़ित को लगभग २० दिनों तक दबाव में रखे जाने और तीन लेन-देन में रकम स्थानांतरित कराने का आरोप है।
यह घटना बताती है कि कानून की जानकारी रखने वाले व्यक्ति भी अत्यधिक दबाव, भय और फर्जी सरकारी पहचान के कारण ठगी का शिकार हो सकते हैं। भारत में किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर तथाकथित डिजिटल गिरफ्तारी में रखने की कोई वैधानिक व्यवस्था नहीं है। फिर भी अपराधी नकली पहचानपत्र, अदालत जैसे दस्तावेज और सरकारी संस्थानों के नाम का इस्तेमाल कर विश्वास पैदा करते हैं।
जांच में रकम किन खातों में गई, खाताधारकों की भूमिका क्या थी और बैंकिंग प्रणाली ने संदिग्ध लेन-देन पर क्या निगरानी की; इन पहलुओं की पड़ताल जरूरी है। साइबर सुरक्षा अभियान केवल ओटीपी नहीं बताने की सलाह तक सीमित नहीं रहने चाहिए।
