मुख्यपृष्ठस्तंभसोशल मीडिया से सत्ता ...अब सोशल मीडिया से खता!

सोशल मीडिया से सत्ता …अब सोशल मीडिया से खता!

राजनीति का यह भी कम दिलचस्प विरोधाभास नहीं है। कभी सोशल मीडिया को लोकतंत्र का नया चौपाल बताया गया, राजनीतिक प्रचार का सबसे तेज हथियार बनाया गया, चुनावी नैरेटिव गढ़े गए, विरोधियों पर हमले हुए, उपलब्धियों का महिमामंडन हुआ और नेताओं की छवि चमकाने के लिए डिजिटल माध्यमों का भरपूर इस्तेमाल किया गया। अब वही सोशल मीडिया सरकारी अधिकारियों के हाथ में ज्यादा सक्रिय दिखने लगा तो सरकार को ‘आचार संहिता’ की जरूरत महसूस होने लगी है।
सरकारी अधिकारियों के लिए सोशल मीडिया कोड बनाने का विचार अपने आप में अनुचित नहीं है। कोई अधिकारी दफ्तर के समय घंटों रील देखे, सरकारी पद का इस्तेमाल निजी लोकप्रियता के लिए करे, संवेदनशील सूचनाएं साझा करे या प्रशासनिक निष्पक्षता को प्रभावित करने वाली सार्वजनिक टिप्पणियां करे तो निश्चित रूप से नियम होने चाहिए। नौकरशाही का काम लोकप्रियता बटोरना नहीं, प्रशासन चलाना है। लेकिन असली प्रश्न नियम बनाने से ज्यादा उनके उद्देश्य और दायरे का है।
क्या प्रस्तावित आचार संहिता केवल रील और स्टोरी तक सीमित रहेगी, या अधिकारी की अभिव्यक्ति पर भी पहरा लगाएगी? क्या सरकार की प्रशंसा करने वाली पोस्ट स्वीकार्य और उसकी किसी नीति की कमजोरी बताने वाली पोस्ट अनुशासनहीनता मानी जाएगी? क्या अधिकारी तथ्य और पेशेवर अनुभव के आधार पर सार्वजनिक बहस में हिस्सा ले सकेगा? यही वह सीमा है जहां ‘आचार संहिता’ और ‘चुप्पी की संहिता’ के बीच फर्क करना जरूरी होगा। विडंबना यह भी है कि राजनीतिक व्यवस्था स्वयं सोशल मीडिया पर अत्यधिक निर्भर हो चुकी है।
सरकारों के मंत्रालय, मंत्री और राजनीतिक दल दिन-रात डिजिटल प्रचार कर रहे हैं।
ऐसे में केवल अधिकारियों को संयम का पाठ पढ़ाना अधूरा समाधान लगेगा। डिजिटल अनुशासन चाहिए तो वह पारदर्शी, निष्पक्ष और स्पष्ट होना चाहिए।
सोशल मीडिया न अच्छा है, न बुरा। उसका चरित्र उसके इस्तेमाल से तय होता है।
इसलिए सवाल यह नहीं कि अधिकारियों पर सोशल मीडिया कोड क्यों बने। सवाल यह है कि क्या यह कोड दुरुपयोग रोकेगा या असहमति? क्योंकि लोकतंत्र में अनुशासन जरूरी है, मगर अनुशासन के नाम पर आवाज बंद कर देना उससे भी बड़ा खतरा है।

 

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