हिमांशु राज
शहर के उजले साइनबोर्ड और भीड़-भाड़ के पीछे एक मंद-सी आवाज घूमती है—“काम।” ट्रेन के प्लेटफॉर्म हों या फास्ट-लाइन पर लगी टैक्सी, रोज इसके लिए लोग आते हैं, कर्ज चुकाते हैं, घर भेजते हैं। पर पिछले कुछ महीनों में यही ‘काम’ जब मराठी के फिल्टर से गुजरा तो कई सवाल खड़े हो गए: किस भाषा में सरकारी नियम बने, किस भाषा में नौकरी टिकेगी और किस भाषा में वोट बनेंगे। टैक्सी-मंजिल पर पहुंचने वाली गति तो वही है—मीटर, सिग्नल, रास्ता—पर दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार से आए कई चालक इस नए ‘भाषाई चेकपॉइंट’ से घबराए हुए हैं।
अनगिनत ड्राइवरों ने 600 रुपये जमा कर मराठी सीखने की कोशिश की; किसी का पैसा गायब हुआ, किसी ने आधी मराठी सीखी और कईयों को आरटीओ से नोटिस मिल गया। 2017 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि किसी चालक के लाइसेंस के लिए मराठी सीखना अनिवार्य नहीं ठहराया जा सकता, फिर भी सड़क-स्तर पर यह दबाव बना रहा; जुर्माने और लाइसेंस संबंधी धमकियों ने उनकी रोजमर्रा की कमाई अस्थिर कर दी है।
यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं रही; इसका राजनीतिक रंग भी तेज हो गया। एक दिन पहले ही एकनाथ शिंदे ने लगभग 20,000 चालकों को मराठी पाठ्यक्रम पूरा करने के प्रमाणपत्र बांटे और अगले दिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मराठी सीखने की समय-सीमा बढ़ाकर अगस्त के अंत से एक साल की मोहलत दे दी।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह ढील राजनीतिक हिसाब-किताब से भी जुड़ी है: कई चालक यूपी लौट रहे हैं, क्योंकि वहां भी ओला-ऊबर जैसी राइड-हेलिंग सेवाएं अच्छी चल रही हैं और वहां काम के अवसर बढ़ रहे हैं। अगले साल यूपी में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में भाजपा व आरएसएस के अंदरूनी विचारों और चुनावी रणनीति को ध्यान में रखकर फडणवीस पर दबाव बना कि यह फैसला चुनावी प्रभाव को देखते हुए लिया जाए और समय-सीमा बढ़ाई जाए, ताकि चुनावी वांछित स्थितियां बनें। इसने दिखाया कि भाषा नीतियों के पीछे अब सिर्फ सांस्कृतिक मुद्दे नहीं, राजनीतिक गणित भी काम कर रहे हैं।
सामाजिक-आर्थिक असर साफ है। कई चालकों ने बैंक से कर्ज लेकर गाड़ी खरीदी है। एक चालक ने बताया कि उसकी मासिक किस्त 15,000 रुपये है और किस्त खत्म होते ही वह घर लौटने का विचार कर रहा है। ऐसे लाखों परिवारों की रोजी-रोटी, बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च इस पर निर्भर है। जब उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में राइड-हेलिंग की सुविधाएं बढ़ती हैं तो प्रवासी चालकों के लिए विकल्प भी बनते हैं—और यह प्रवाह स्थानीय चुनावी समीकरण को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए नीति बनाते समय आर्थिक वास्तविकताओं और राजनीतिक निहितार्थ, दोनों का आकलन जरूरी हो जाता है।
मुंबई की पहचान बहुभाषी रही है—सड़कों पर मराठी, हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी की बोलियां मिलती हैं। पर जब भाषा को नौकरी की शर्त बना दिया जाता है तो यह विविधता दबाव में बदल जाती है। व्यावहारिक समाधान के तौर पर समय-सीमाएं बढ़ाना, चरणबद्ध और सुलभ प्रशिक्षण देना, प्रमाणन की पारदर्शिता सुनिश्चित करना और प्रभावितों के लिए अस्थायी छूट या आर्थिक मदद देने जैसे कदम लिए जा सकते हैं। साथ ही यह भी जरूरी है कि नीति बनाते और लागू करते समय परिवहन विभाग, चालकों के संघ और स्थानीय समुदायों की भागीदारी हो, ताकि नियम जमीन पर बिना बड़े झटकों के लागू हों और गैर-जरूरी पलायन तथा राजनीतिक असंतुलन न पैदा हो।
सवाल वही है: क्या मराठी सीखना उद्देश्य है या निशाना? जब नियम सड़क तक पहुंचते हैं, उनका असर सिर्फ कागज पर नहीं, घर की रोटी और बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ता है। काम करने वालों की मांगें—काम, समय और इज्जत—ध्यान में रखकर ही कोई टिकाऊ और संवेदनशील हल निकाला जा सकता है।
