दर्द-ए-दिल का फ़साना तू बनाता क्यूं है।
बेसबब दिल को तू अपने यूं दुखाता क्यूं है
तेरे दीदार को तरसे ये निगाहें मेरी
ऐ सनम पर्दे दरीचों पे गिराता क्यूं है
इश्क़ हर एक से होता भी नहीं है लेकिन
एक कोई तो भला दिल को लुभाता क्यूं है
मेरी मासूम मुहब्बत तके रस्ता तेरा
होके ग़ायब तू मुझे इतना सताता क्यूं है
कहना तू चाहता है पर जुबां चुप है तेरी
बात कोई भी अपने दिल में दबाता क्यूं है
नींद ख़ामोश सी पलकों पे रुकी रहती है
ख़्वाब आने दे इन आँखों को जगाता क्यूं है
अब कनक दिल में छुपा कर इसे रख ले अपने
प्यार है तुझको तो दुनिया को जताता क्यूं है।
-डॉ. कनक लता तिवारी
