राजन पारकर
कहते हैं युद्ध सीमाओं पर लड़े जाते हैं, लेकिन भारत में उनकी असली कीमत आम आदमी की जेब चुकाती है। ईरान और अमेरिका एक-दूसरे पर मिसाइलें दाग रहे हैं और उसका धुआं सीधे मुंबई के वड़ापाव के तवे तक पहुंच गया है। हालात ऐसे हैं कि अब वड़ापाव खाना भी किसी मध्यमवर्गीय आदमी के लिए आर्थिक साहस का विषय बनता जा रहा है।
तेल महंगा, गैस महंगी, पाव महंगा, आलू महंगा! महंगाई की इस सुनियोजित लूट में सिर्फ ग्राहक सस्ता बचा है। सरकारें आश्वासन दे रही हैं, अर्थशास्त्री टीवी स्टूडियो में ज्ञान बांट रहे हैं और आम आदमी अपने बटुए में बची आखिरी नोट को देखकर सोच रहा है कि पेट भरे या पेट्रोल डलवाए।
मुंबई की पहचान कभी लोकल ट्रेन और वड़ापाव से होती थी। लोकल पहले ही भीड़ के बोझ से कराह रही थी, अब वड़ापाव भी महंगाई के बोझ तले दब गया है। कल तक जो वड़ापाव २० रुपए में मिलता था, वह आज २५ का, कल ३० का और परसों शायद ‘प्रीमियम स्ट्रीट फूड’ घोषित होकर ३५ रुपए का मिलेगा। ऐसा लगता है कि वड़ापाव नहीं, शेयर बाजार में सूचीबद्ध कोई बहुराष्ट्रीय उत्पाद बिक रहा हो। सबसे बड़ा मजाक यह है कि हर बार महंगाई का कारण हजारों किलोमीटर दूर किसी न किसी अंतर्राष्ट्रीय संकट को बताया जाता है। कभी युद्ध, कभी तेल संकट, कभी वैश्विक मंदी। लेकिन जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें घटती हैं, तब आम आदमी के हिस्से में राहत क्यों नहीं आती? यह सवाल पूछना आजकल देशद्रोह से कम नहीं माना जाता। महंगाई अब आर्थिक समस्या नहीं रही, यह एक संगठित अत्याचार बन चुकी है। वेतन कछुए की चाल से बढ़ता है और कीमतें रॉकेट की रफ्तार से भागती हैं। नौकरी वही, तनख्वाह वही, लेकिन खर्च हर महीने नया रिकॉर्ड बना रहा है। सरकार कहती है अर्थव्यवस्था मजबूत है। जनता पूछ रही है-अगर अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है तो जेब इतनी कमजोर क्यों है?
जिस वड़ापाव को कभी गरीब और मेहनतकश आदमी का साथी कहा जाता था, वही अब उसकी पहुंच से बाहर जाने लगा है। जल्द ही वह दिन भी आएगा जब वड़ापाव की दुकान पर लिखा होगा-‘वैâश, यूपीआई और ईएमआई तीनों स्वीकार हैं।’
सच्चाई यह है कि इस देश में महंगाई कभी दुर्घटना नहीं होती, उसे व्यवस्था का हिस्सा बना दिया जाता है। जनता हर बार चुप रहती है, इसलिए कीमतें हर बार और बेखौफ बढ़ती हैं। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, भाषण बदलते हैं, लेकिन आम आदमी की थाली पर हमला कभी बंद नहीं होता। आज मिसाइलें ईरान और अमेरिका के बीच उड़ रही हैं, लेकिन उनका सबसे बड़ा निशाना मुंबई का वड़ापाव बन गया है। और अगर यही हाल रहा, तो आने वाले दिनों में आम आदमी वड़ापाव खाएगा नहीं, बल्कि उसकी पुरानी कीमतों को याद करके आहें भरेगा। जनता का सवाल सीधा है- युद्ध कौन जीत रहा है, यह बाद की बात है… लेकिन महंगाई के इस युद्ध में आम आदमी आखिर कब तक हारता रहेगा?
