राजन पारकर
अयोध्या में भगवान राम विराजमान हैं। करोड़ों भक्त सिर झुकाकर आते हैं, जेब से दान निकालते हैं और मन में यही विश्वास रखते हैं कि यह अर्पण प्रभु के चरणों में पहुंचेगा, लेकिन यदि आरोपों के अनुसार वही दान किसी गिरोह की जेब में पहुंच रहा हो, तो फिर यह चोरी नहीं, श्रद्धा के माथे पर कालिख है।
कहते हैं कि जहां भगवान होते हैं, वहां न्याय होता है। पर यहां तो यदि आरोप सही साबित होते हैं, न्याय की चौखट तक पहुंचने से पहले दानपेटी का रास्ता ही बदल गया। रामलला को चढ़ाया गया धन कथित तौर पर परिक्रमा मार्ग पर बैठकर बांटा जाता रहा। यह मंदिर था या मुनाफे का मंडीघर?
सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि किसने चोरी की। प्रश्न यह है कि इतनी बड़ी व्यवस्था में चोरी होती रही और व्यवस्था के पहरेदार क्या कर रहे थे। क्या उनकी आंखों पर श्रद्धा की पट्टी बंधी थी या सुविधा का चश्मा चढ़ा था?
आरोप यह भी हैं कि एक कथित स्थानीय दबंग का ऐसा प्रभाव था कि कर्मचारी उसके इशारे पर चलते थे, आदेश वॉकी-टॉकी से जारी होते थे और पूरी व्यवस्था मानो किसी निजी कंपनी की शाखा बन गई थी। यदि यह सच है, तो फिर मंदिर का प्रबंधन कौन चला रहा था, भगवान या भगवान के नाम पर बैठे स्वयंभू ठेकेदार?
और रही बात वीआईपी दर्शन की! वाह रे कलियुग! भगवान तो वनवास में निषादराज को गले लगाते थे, शबरी के जूठे बेर खाते थे, लेकिन आज उनके दर्शन भी कथित रूप से पैकेज में बिकने लगे। पांच सौ का भगवान, हजार का भगवान, दो हजार का भगवान! लगता है अब मोक्ष भी जीएसटी स्लैब में आने ही वाला है।
भक्त लाइन में खड़ा रहे, दलाल सीधा गर्भगृह तक पहुंच जाए, यही अगर नई धार्मिक व्यवस्था है, तो फिर मंदिर और मॉल में अंतर ही क्या बचा?
धर्म का सबसे बड़ा शत्रु नास्तिक नहीं होता, बल्कि वह व्यक्ति होता है जो भगवान का नाम लेकर अपनी तिजोरी भरता है। ऐसे लोग मंदिर की घंटी नहीं बजाते, वे जनता की आस्था की जेब काटते हैं।
यदि जांच में ये आरोप सिद्ध होते हैं, तो केवल कुछ आरोपी नहीं, पूरी व्यवस्था कठघरे में खड़ी होगी। क्योंकि चोरी करने वाला उतना ही दोषी होता है, जितना चोरी देखकर भी मौन रहने वाला।
राम भारतीय संस्कृति के आदर्श हैं, किसी गिरोह की आय का स्रोत नहीं। राम का नाम वोट के लिए लिया जा सकता है, भाषण के लिए लिया जा सकता है, लेकिन राम के नाम पर श्रद्धा की लूट किसी भी सभ्य समाज के लिए सबसे बड़ा पाप है।
अब समय आ गया है कि दानपेटी पर ताला लगाने से पहले व्यवस्था के लालच पर ताला लगाया जाए। क्योंकि मंदिर की रक्षा पत्थरों से नहीं, चरित्र से होती है। और जहां चरित्र बिक जाए, वहां घंटियों की आवाज भी अंत:करण को नहीं जगा सकती।
विश्वास की लूट सबसे बड़ा अपराध
भक्त मंदिर में धन नहीं, अपनी श्रद्धा अर्पित करता है। यदि उसी आस्था के साथ छल होता है, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के विश्वास पर प्रहार है। मंदिरों की पवित्रता बनाए रखने के लिए दान व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी, जवाबदेह और दलालों से मुक्त होना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
