राजन पारकर
सत्ता आई, कुर्सी मिली, गाजर बांटी गईं, पर थाली में खाने को ‘एक फूटीr कौड़ी’ तक नहीं!
महाराष्ट्र में अब विकास नहीं, विकास के नाम पर कौड़ीबाजी का नया खेल चल रहा है!
शिंदे गुट के विधायक किशोर पाटील बोले, ‘विधायक बने एक साल हुआ, मगर निधि नहीं!’
अरे निधि नहीं तो क्या हुआ, कुर्सी तो मिली न!
यह शिंदे-फडणवीस सरकार तो वैसी है, जैसे शादी के दूसरे दिन ही हनीमून पर झगड़ने वाला जोड़ा!
दोनों कहते हैं, ‘हम महायुति हैं’-पर एक-दूसरे को ऐसे देखते हैं, जैसे दो तृप्त कुत्ते एक ही हड्डी पर नजर गड़ाए हों!
विधायकों को पैसा नहीं, मगर जाहिरातों में अरबों-खरबों!
सड़क पर गटर खुले, लेकिन सोशल मीडिया पर ‘महाराष्ट्र दौड़ता है!’
यह नई ‘दौड़’ तो वैसी है, जैसे पानी में जूते पहनकर भागना-न गति, न दिशा, बस शब्दों की फुरफुराहट!
गुलाबराव पाटील ने भी इस शिकायत को सही ठहराया-यानी सरकार में रहकर सरकार पर दोष डालो!
जैसे घर की चोरी के लिए पड़ोसी के कुत्ते को दोष देना!
वो कहते हैं, ‘कुछ इलाकों में काम नहीं हुआ।’
अरे जहां हुआ वहां क्या मंदिर बन गया? या ‘काम’ का मतलब अब सिर्फ ठेके और चुनाव से पहले फीता काटना रह गया है?
आज हर नेता कहता है, ‘मैंने विकास किया।’ पर जब पूछा जाए ‘कहां?’, तो सबकी उंगलियां आसमान में!
यह विकास नहीं, राजनीतिक वाई-फाई है-सिग्नल हर जगह, पर नेटवर्क कहीं नहीं!
और कहते हैं, पाटील यह मामला मोदी तक ले जाएंगे।
मतलब घर में बिजली नहीं, तो शिकायत लेकर सूर्य मंडल तक पहुंच जाना!
दिल्ली से जवाब आएगा-‘अच्छे दिन आ रहे हैं’-और महाराष्ट्र में फूटी कौड़ी का सर्कस चलता रहेगा!
महायुति अब राजनीतिक सर्कस की जादूगरों की टीम बन गई है।
एक नेता के पास जादू की छड़ी, दूसरे के पास धुआं,
और जनता-बेचारी-ताली बजा रही है कि ‘कुछ तो होगा!’
असल में, ‘फूटी कौड़ी’ अब सिर्फ विधायकों की नहीं, जनता की किस्मत की मुद्रा बन गई है।
इसी कौड़ी पर सरकारें चल रही हैं, दल बढ़ रहे हैं और जनता अब भी उम्मीद में है-कब खत्म होगा यह कौड़ी का राज!
एक नाराज, मगर अब भी मुस्कुराता नागरिक।
