– पुलिस के दावे व निगरानी पर उठे सवाल
नीलम रामअवध / मुंबई
मुंबई की लोकल ट्रेनें जिन्हें शहर की जीवनरेखा कहा जाता है, आज चोरों के लिए सबसे आसान निशाना बन चुकी हैं। हर हफ्ते औसतन १३५ यात्री अपने मोबाइल फोन से हाथ धो बैठते हैं और हैरानी की बात यह है कि यह सब जीआरपी की मौजूदगी के बीच होता है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, साल २०२२ से अब तक कुल ३७,३९८ मोबाइल चोरी के मामले मुंबई की रेलवे पुलिस के पास दर्ज हुए हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ १६,१५४ मामलों को ही सुलझाया जा सका है। यानी करीब ५७ फीसदी मामले आज भी अनसुलझे हैं। सवाल यह उठता है कि इतने बड़े आंकड़े के बावजूद रेलवे पुलिस की निगरानी व्यवस्था क्यों नाकाम साबित हो रही है? चोरी की घटनाएं अक्सर उन्हीं स्टेशनों पर हो रही हैं, जिन्हें हाई रिस्क जोन माना जाता है और जहां पुलिस बल की मौजूदगी सबसे ज्यादा मानी जाती है। कुर्ला, कल्याण जैसे बड़े स्टेशनों पर हर रोज औसतन २ से ३ फोन चोरी हो रहे हैं, लेकिन वहां मौजूद पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में है। चोरी का तरीका बेहद चालाकी से अंजाम दिया जाता है। सबसे ज्यादा घटनाएं तब होती हैं जब यात्री भीड़भाड़ में चढ़ या उतर रहे होते हैं। अक्सर पीड़ितों को तब पता चलता है, जब वे ट्रेन से उतर चुके होते हैं। एफआईआर भी उसी स्टेशन पर दर्ज होती है, जहां यात्री को फोन गायब होने का एहसास होता है, जिससे असली घटनास्थल की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। रेलवे पुलिस यह दावा करती है कि उन्होंने कुछ मामलों में आरोपियों को पकड़ा है और चोरी के कुछ फोन भी बरामद किए हैं।
आधे मामले भी नहीं सुलझे
२०२३ में दर्ज १२,९८९ मामलों में ५,४२२ ही सुलझे। २०२५ में अब तक ३,५०८ मामले दर्ज हो चुके हैं, जिनमें से सिर्फ १,४११ मोबाइल ही वापस मिले हैं। रिपोर्ट की मानें तो जीआरपी का कहना है कि उन्होंने स्टेशनों पर गश्त बढ़ा दी है, सीसीटीवी फुटेज का सहारा लिया जा रहा है और अपराधियों पर नजर रखी जा रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यात्रियों के फोन लगातार चोरी हो रहे हैं और पुलिस सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नजर आती है।
