सामना संवाददाता / मुंबई
महायुति शासन में व्यवस्था की बेरुखी का एक और शर्मनाक चेहरा मुंबई में सामने आया है, जहां यौन उत्पीड़न की शिकार एक पीड़िता को जरूरी एमआरआई जांच तक नसीब नहीं हुई। एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने के दावे करती है, तो दूसरी तरफ जीटी अस्पताल में मंजूरी और डॉक्टरों की कमी के कारण एक संवेदनशील मामले में भी मरीज की जान घंटों तक अधर में लटकी रही। हालात इतने बदतर रहे कि तत्काल जांच की जरूरत होने के बावजूद प्रशासनिक ढिलाई, समन्वय की कमी और जिम्मेदारी टालने की प्रवृत्ति के चलते पीड़िता को बिना जांच के ही वापस भेज दिया गया।
मुंबई में स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर खामियां उजागर करने वाला एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां यौन उत्पीड़न की शिकार एक युवती को अत्यावश्यक एमआरआई जांच तक नहीं मिल सकी। जानकारी के अनुसार, पीड़िता को पहले सेंट जॉर्ज अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसे लगातार दौरे पड़ रहे थे, जिसके चलते डॉक्टरों ने तत्काल एमआरआई जांच की जरूरत बताई। इसी आधार पर उसे जीटी अस्पताल रेफर किया गया, लेकिन वहां पहुंचने के बाद भी जांच नहीं हो सकी। मामले में सबसे बड़ी चूक प्रशासनिक समन्वय की सामने आई। एमआरआई के लिए आवश्यक अनुमति समय पर नहीं मिल पाई, वहीं उस समय एनेस्थेटिस्ट की उपलब्धता को लेकर भी स्पष्टता नहीं थी। तकनीकी स्टाफ मौजूद होने के बावजूद निर्णय लेने में देरी और जिम्मेदारी तय न होने के कारण जांच प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि अंतत: बिना किसी जांच के ही पीड़िता को वापस सेंट जॉर्ज अस्पताल भेज दिया गया। ऐसे मामलों में जहां तुरंत जांच और रिपोर्ट जरूरी होती है, वहां इस तरह की लापरवाही सीधे तौर पर मरीज के इलाज और स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। यह घटना न केवल अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाती है, बल्कि महायुति सरकार के स्वास्थ्य मॉडल की जमीनी सच्चाई भी उजागर करती है।
जीटी अस्पताल में आधिकारिक रूप से शुरू नहीं है एमआरआई
इस बीच यह भी सामने आया है कि जीटी अस्पताल में एमआरआई सेवा का आधिकारिक उद्घाटन अभी तक नहीं हुआ है। इसके बावजूद इसे सीमित रूप में शुरू किया गया है। इस अनौपचारिक व्यवस्था के चलते निर्णय प्रक्रिया और अधिक उलझी हुई नजर आती है, जिसका खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।
