झेल सकता हृदय टकोर नहीं
भाव कोमल रखो कठोर नहीं
मुक्ति सौतन भी चाहती है पर
रात की हो रही है भोर नहीं
प्रीत की रीत आप क्या जानें
आप तो चंद्र हैं चकोर नहीं
आप जैसा कोई नहीं देखा
चित चुराते हैं फिर भी चोर नहीं
कैसे कह दें उसे सरोवर भी
जिस हृदय में उठे हिलोर नहीं
हैं तो हम लोग भी रसिक लेकिन
रस के प्रेमी हैं हम चटोर नहीं।
-(बहुभाषी शायर नवीन सी. चतुर्वेदी)
