-दुबराजपुर, नैनी गांव और छिवकी-ददरी में लाल निशानों ने बढ़ाईं ग्रामीणों की धड़कनें, 21 अक्टूबर तक घर खाली करने का अल्टीमेटम
-बच्चों और बुजुर्गों को लेकर कहां जाएंगे परिवार?..बेदखली से पहले पुनर्वास की गुहार
राजेश सरकार / प्रयागराज
किसी के लिए मकान ईंट-पत्थर की दीवारें हो सकती है, लेकिन किसी गरीब परिवार के लिए वही उसकी पूरी दुनिया होती है। उन्हीं दीवारों के बीच बच्चों का बचपन बीतता है, बुजुर्गों की यादें बसती हैं और कई पीढ़ियों के संघर्ष की कहानी सांस लेती है। लेकिन जब उसी आशियाने को खाली करने का नोटिस दरवाजे पर पहुंच जाए और मकान पर लाल निशान लगा दिया जाए, तो जिंदगी की सारी जमा-पूंजी और भविष्य की उम्मीदें एक साथ डगमगाने लगती हैं। कुछ ऐसा ही दर्द इन दिनों नैनी थाना क्षेत्र के छिवकी स्थित दुबराजपुर और नैनी गांव के दर्जनों परिवारों के सामने खड़ा हो गया है।
रेलवे प्रशासन ने दुबराज पुर, छिवकी और नैनी गांव के 20 से अधिक मकानों को अतिक्रमण बताते हुए उन्हें खाली करने का नोटिस जारी किया है। मकानों पर लाल रंग से निशान भी लगाए गए हैं। नोटिस में ग्रामीणों को 21 अक्टूबर तक मकान खाली करने की मोहलत दी गई है। तय समयसीमा के भीतर मकान खाली नहीं करने पर कार्रवाई की चेतावनी से गांव में बेचैनी बढ़ गई है। जिन घरों में रोजमर्रा की जिंदगी सामान्य ढंग से चल रही थी, वहां अब उजड़ने की आशंका ने डेरा जमा लिया है।
चार पीढ़ियों की यादें समेटे घर, अब कहां मिलेगी छत?
ग्रामीणों का कहना है कि वे चार पीढ़ियों से इसी जगह पर रहते आ रहे हैं। इसी मिट्टी से उनका नाता है, इसी गांव में उनकी जिंदगी की जड़ें फैली हैं और यहीं उनके परिवारों का भविष्य पल रहा है। खेती-बाड़ी और रोजमर्रा के कामकाज के सहारे जीवन चलाने वाले इन परिवारों के लिए अचानक दूसरी जगह जाकर बसना आसान नहीं है।
ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि मकान खाली करने के बाद उन्हें कहीं और ठिकाना नहीं मिला, तो वे अपने परिवार को लेकर कहां जाएंगे? बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल और घरेलू सामान के साथ नया आशियाना तलाशना उनके लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।
सर्दियों की आहट, सिर पर छत छिनने का डर
मौसम बदल रहा है और सर्दियां दस्तक देने की तैयारी में हैं। ऐसे समय में घर छिनने की आशंका ने ग्रामीणों की चिंता और बढ़ा दी है। महिलाओं और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा फिक्र छोटे बच्चों और परिवार की सुरक्षा की है। उनका कहना है कि यदि रहने का कोई वैकल्पिक इंतजाम किए बिना मकान तोड़ दिए गए, तो परिवारों को खुले आसमान के नीचे रातें गुजारने की नौबत आ सकती है।
लाल निशान लगे मकानों को देखकर परिवारों के मन में अनिश्चित भविष्य की तस्वीर उभर रही है। जिन घरों को उन्होंने अपना स्थायी ठिकाना समझा था, उन्हीं को छोड़ने की नौबत आने से वे मानसिक और आर्थिक संकट से घिरे हैं।
रेलवे की कार्रवाई के बीच मानवीय पहल की आस
ग्रामीणों ने रेलवे प्रशासन और जिला प्रशासन से मामले में मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है। उनकी मांग है कि बेदखली की कार्रवाई से पहले उनके रहने की वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया जाए, ताकि परिवार अचानक बेघर होने से बच सकें।
रेलवे की ओर से मकानों को अतिक्रमण बताकर नोटिस जारी किया गया है, वहीं ग्रामीण अपने लंबे समय से चले आ रहे निवास और उससे जुड़े पारिवारिक जीवन का हवाला दे रहे हैं। ऐसे में मामले में संबंधित अभिलेखों की जांच, ग्रामीणों का पक्ष सुनने और नियमानुसार कार्रवाई के साथ पुनर्वास की मांग पर विचार किए जाने की जरूरत है।
दुबराजपुर के इन परिवारों के सामने अब समय कम और सवाल ज्यादा हैं। 21 अक्टूबर की समयसीमा नजदीक आने के साथ उनकी निगाहें प्रशासन और रेलवे अधिकारियों पर टिकी हैं। उनके लिए यह केवल मकान खाली करने का मामला नहीं, बल्कि पीढ़ियों से बसे जीवन और भविष्य की सुरक्षा का सवाल है। अब देखना है कि कार्रवाई की समयसीमा के बीच इन परिवारों को राहत की कोई राह मिलती है या उनके सिर से छत छिनने का खतरा और गहरा जाता है।
