-विमल मिश्र
काशी की रामलीलाएं गोस्वामी तुलसीदास की देन हैं। इन रामलीलाओं में रामनगर की रामलीला विशिष्ट है, जिसे यूनेस्को ने ‘भारत का हेरिटेज’ घोषित किया है।
नवरात्र शुरू हो गए हैं और रामलीलाएं भी। गोस्वामी तुलसीदास ने अपने युग की निरक्षर और दीन जनता तक रामकथा का संदेश पहुंचाने के लिए लोकभाषा को रामलीला का मंच बनाया। साढ़े चार सौ से अधिक वर्षों से अखंड रूप से चल रही काशी की ‘चित्रकूट रामलीला’ विश्व में किसी भी प्रदर्शन का विश्व कीर्तिमान है, पर सबसे प्रसिद्ध है रामनगर की रामलीला, जिसे यूनेस्को ने ‘भारत का हेरिटेज’ घोषित किया है।
पेट्रोमैक्स लैंप की मंद रोशनी, लाइट व माइक की अनुपस्थिति में भी स्टीरियोफोनिक साउंड और मंच-विधान कुछ भी नहीं। रामनगर की रामलीला ओपन थिएटर की तर्ज की लीलाओं में विश्व की विशालतम रामलीला कहलाती है। वे किंवदंतियां… पादरी के ताने पर रामलीला के हनुमानजी का बाढ़ से उफनती ४० हाथ चौड़ी वरुणा को फलांग जाना… ‘भरत मिलाप’ का छायांकन वर्जित स्थल से करने पर बीबीसी टीम के कैमरे का शटर खुलना ही नहीं… लीला के वृद्ध दर्शक के कुएं में गिरने पर भी उसे खरोंच तक नहीं आना। वे विचित्र विधान… रामनगर की रामलीला में धनुष यज्ञ, नक्कटैया और लक्ष्मण शक्ति के दिन तोपों से सलामी दिया जाना… राम विवाह में सरकारी बैंड आगे चलना और १,००० छिद्रों वाला मालपुआ बनना… रावण वध के समय रामजी के तीर मारने पर रावण का मुखौटा उतारकर राम के पास जाना और प्रणाम करके सीधे अपने गांव प्रस्थान कर जाना… इस लीला में राज्याभिषेक का मंचन रामलीला का वह सोपान है, जब काशिराज अयोध्या नरेश की अधीनता स्वीकार करते हैं और रामजी काशी नरेश बन जाते हैं।
काशी में चित्रकूट और असी की रामलीलाएं जहां २२ दिन की होती हैं, वहीं रामनगर की लीला ३० दिन की। इस रामलीला के नेमी दर्शक नंगे पांव सुबह ही पैदल रामनगर निकल जाते हैं, तालाबों पर नहाकर तिलक-भस्म लगाकर तैयार होते हैं और बना-खाकर लीला देखने पहुंच जाते हैं। दर्शक ही यहां जन है और दृश्य भी। यह वास्तविक कर्मकांडों वाली वह घटित लीला है, जिसमें दर्शक लीला का पात्र बनकर अपनी भूमिका जीते हैं। रामलीला के संवाद भी उन्हें कंठस्थ होते हैं। लीलाओं के अलग-अलग स्थान तय होने से पूरा रामनगर ही रंगमंच बन जाता है और दृश्य और दर्शक में कोई विभाजन रेखा रहती ही नहीं। दरबार में दरबारी, बारात में बाराती, वनगमन में वनवासी और पूजन के समय भक्त। भगवान यहां स्वयं भक्त बन जाते हैं।
रामनगर की रामलीला घटित लीला है, जिसमें पात्र अपनी भूमिका जीते हैं और हजारों की तादाद में उपस्थित नेमी व आम दर्शक और देश भर से पधारे तिलक-त्रिपुंड लगाए, नामकीर्तन और गुटका लिए रामभक्त और साधु-संत स्वयं उसके पात्र बन जाते हैं। मसलन, वही दर्शक जो रामजी की सेना में उनका सैनिक बना है, रावण के दरबार में उसका दरबारी भी बन सकता है और भरत मिलाप के समय अयोध्या का नागरिक भी। यदि लक्ष्मण को शक्तिबाण लगने पर रामजी के विलाप करने जैसा कारुणिक प्रसंग हो, तो उनके साथ रोते भी हैं। बीच-बीच में ‘बोलो, राजा रामचंद्र की जय’ के नाद के साथ दर्शक धोती-कुर्ता पहने और पीला साफा बांधे, ढोल-मंजीरा, झांझ-करताल के साथ उत्तर-प्रत्युत्तर की स्पर्धा में आमने-सामने बैठे रामायणियों के साथ ही नारदबानी में पाठ करते रहते हैं। रामनगर की रामलीला का एक बड़ा आकर्षण होते हैं खुद काशी नरेश, जो हाथी के हौदे पर दर्शक के रूप में इसे देखने तकरीबन रोज ही आया करते हैं।
‘चुप रहो, सावधान’ की टेर सुनते ही हजारों की भीड़ के बीच निस्तब्ध सन्नाटा छा जाए, तो यह सिर्फ और सिर्फ रामनगर की रामलीला में ही संभव है। संवाद की अवधि में आप बोलें या आपका कैमरा या मोबाइल फोन बोले, तो अपने ही बगल में खड़े श्रोता द्वारा गर्दन पकड़कर बाहर किए जाने के लिए तैयार रहें। इसे विश्व में सबसे अनुशासित धार्मिक कार्यक्रम यूं ही नहीं कहा जाता।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
