-प्रो. दयानंद तिवारी
आज साहित्य और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के संबंध पर बहस तेज है। एक पक्ष कहता है कि साहित्य को एआई की चुनौती स्वीकार करनी चाहिए तो दूसरा पक्ष आशंकित है कि तकनीक कहीं मानवीय सृजन की जगह न ले ले। इस बहस के बीच एक बेचैन करने वाला दृश्य भी दिखाई देता है: कुछ रचनाकार अपनी बात के दो-चार संकेत किसी ऐप में डालते हैं और कुछ ही क्षणों में एक पूरा आलेख, कविता या कहानी सामने आ जाती है। फिर उसे अपने नाम से प्रस्तुत कर दिया जाता है। सवाल यह नहीं कि एआई का उपयोग हो रहा है या नहीं। सवाल यह है कि क्या सुविधा के साथ हमारी मौलिक सोच, संवेदना और लेखकीय जिम्मेदारी भी किसी मशीन को सौंपी जा रही है?
तकनीक का स्वागत, विवेक के साथ
एआई को शत्रु मानना समझदारी नहीं होगी। हर युग में नई तकनीक ने अभिव्यक्ति के तरीके बदले हैं। छापाखाने ने पुस्तक को अधिक लोगों तक पहुंचाया, रेडियो और सिनेमा ने कहानी कहने के नए माध्यम दिए, कंप्यूटर ने लेखन और संपादन को सरल बनाया। एआई भी इसी तकनीकी यात्रा की अगली कड़ी है। वह भाषा को व्यवस्थित कर सकता है, विषयों की रूपरेखा बना सकता है, कठिन पाठ का सार दे सकता है और विचारों के बीच संबंध खोजने में मदद कर सकता है। शोध, अनुवाद, प्रारूप-संशोधन और विचार-विस्तार जैसे कामों में इसका उपयोग उपयोगी है। जो लेखक इसका विवेकपूर्ण उपयोग करता है, वह अपने श्रम को अधिक सार्थक दिशा दे सकता है।
सुविधा और सृजन का अंतर
लेकिन सुविधा और सृजन एक ही बात नहीं हैं। साहित्य केवल शब्दों का सुव्यवस्थित क्रम नहीं, बल्कि जीवन को अनुभव करने और उसका अर्थ खोजने की प्रक्रिया है। किसी मजदूर की थकी हुई हथेली, घर लौटते हुए पिता की चुप्पी, पहली बार अपमान झेलती बच्ची की आंखों में उठा प्रश्न इन दृश्यों में साहित्य का बीज होता है। लेखक उन्हें देखता है, अपने भीतर संजोता है, उनसे विचलित होता है और फिर उन्हें भाषा देता है। एआई इन अनुभवों पर लिखे गए लाखों पाठों से भाषा के ढांचे और संभावित अगला वाक्य पहचान सकता है; पर उसने स्वयं भूख, अपमान, प्रेम, भय या बिछोह नहीं जिया। वह अनुभवों के वर्णन का पुनर्संयोजन कर सकता है, अनुभव का जीवन नहीं।
भाषा में समानता, अनुभव में भिन्नता
यहीं साहित्य और एआई की समानता तथा भिन्नता दोनों स्पष्ट होती हैं। दोनों भाषा के माध्यम से विचार व्यक्त करते हैं; दोनों किसी विषय को अलग-अलग कोणों से प्रस्तुत कर सकते हैं; दोनों पाठक तक सूचना और भाव का आभास पहुंचा सकते हैं। एआई की भाषा कई बार प्रवाहपूर्ण, आकर्षक और तत्काल प्रभावशाली भी लगती है। लेकिन साहित्य की कसौटी केवल प्रवाह नहीं है। साहित्य में लेखक की दृष्टि, उसके समय की पहचान, समाज के प्रति उसकी संवेदना और कथन के पीछे खड़ा उसका नैतिक साहस शामिल होता है। एआई के पास आंकड़ों से बनी भाषा है; लेखक के पास जीवन से बनी दृष्टि हो सकती है। यह अंतर मिटा देना साहित्य की प्रकृति को ही हल्का कर देना होगा।
लेखक की भूमिका: विचारक या केवल निर्देशदाता?
एक चिंता यह भी है कि जब रचना तैयार कराने की पूरी जिम्मेदारी ऐप को सौंप दी जाती है, तब लेखक की भूमिका धीरे-धीरे निर्देश देने वाले तक सिमट जाती है। वह विषय बताता है, शब्द-सीमा तय करता है, कुछ भाव जोड़ने को कहता है और फिर तैयार रचना पर अपना नाम रख देता है। यह प्रक्रिया किसी विचार को संवारने में सहायक हो सकती है, लेकिन विचार का स्थानापन्न नहीं बन सकती। ठेके पर कराया गया काम प्राय: मांगी गई शर्तें पूरी करता है; साहित्य को उससे आगे जाना होता है। उसे अनपेक्षित प्रश्न उठाने होते हैं, प्रचलित धारणाओं को चुनौती देनी होती है और पाठक को अपने भीतर झांकने के लिए विवश करना होता है।
चमकदार भाषा और भीतर का खालीपन
एआई से बनी रचना कई बार इतनी परिष्कृत दिखती है कि उसकी सतही चमक उसके भीतर के खालीपन को छिपा देती है। उसमें उचित शब्द, संतुलित अनुच्छेद और प्रभावकारी निष्कर्ष हो सकते हैं, पर क्या उसमें लेखक का कोई जोखिम है? कोई निजी स्मृति, कोई असुविधाजनक सच, कोई ऐसी दृष्टि जो केवल उसी लेखक की हो? यदि हर रचना एक जैसी भाषा, समान उपमाओं और सुरक्षित निष्कर्षों की ओर बढ़े, तो साहित्य में विविधता घटेगी। भाषा का लोकतंत्र केवल बहुत-सा लिखे जाने से नहीं बनता; उसमें अलग-अलग जीवनानुभवों को बोलने का अवसर भी चाहिए।
एआई का जिम्मेदार उपयोग
यह कहना भी सही नहीं होगा कि एआई का इस्तेमाल करने वाला हर रचनाकार मौलिकता छोड़ देता है। तकनीक का नैतिक मूल्य उसके उपयोग से तय होता है। लेखक एआई से प्रश्न पूछ सकता है, तथ्य जाँचने के लिए संकेत ले सकता है, अपने मसौदे की भाषा पर सुझाव मांग सकता है और फिर निर्णय स्वयं कर सकता है। लेकिन उसे स्रोतों की पुष्टि करनी चाहिए, तथ्यात्मक त्रुटियों को सुधारना चाहिए और पाठक के सामने अपनी भूमिका के बारे में ईमानदार रहना चाहिए। एआई द्वारा उत्पन्न सामग्री को बिना जांच, बिना संपादन और बिना आत्मसात किए अपना मौलिक लेखन बताना पाठक के विश्वास के साथ अन्याय है।
साहित्यिक संस्थाओं और शिक्षा की जिम्मेदारी
आज शिक्षा और साहित्यिक संस्थानों के सामने भी यही जिम्मेदारी है। विद्यार्थियों और लेखकों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि एआई से सामग्री वैâसे बनती है; उन्हें यह समझाना होगा कि मौलिक विचार वैâसे विकसित होते हैं, स्रोतों का श्रेय क्यों जरूरी है और लेखकीय ईमानदारी का अर्थ क्या है। प्रकाशन संस्थानों को भी स्पष्ट मानक बनाने चाहिए कि कहां एआई सहायता स्वीकार्य है, कहां उसका उल्लेख जरूरी है और कहां मानव लेखकीय योगदान ही मूल कसौटी रहेगा। साथ ही, रचनाकारों को अपनी भाषा, अध्ययन और अवलोकन की साधना जारी रखनी होगी। तकनीक विचार की जगह तभी लेती है जब हम विचार करना छोड़ देते हैं।
चुनौती को स्वीकारें, आत्मसमर्पण नहीं
एआई साहित्य का अंत नहीं है। वह साहित्य के सामने एक नई परीक्षा अवश्य है। वह हमें यह पूछने पर विवश करता है कि रचना में मनुष्य का अपरिहार्य योगदान क्या है। इसका उत्तर केवल इतना नहीं कि मनुष्य भावुक होता है। मनुष्य अपने समय का साक्षी है; वह अपने निर्णयों और शब्दों के परिणामों के लिए उत्तरदायी है। वह भाषा में केवल संभावित वाक्य नहीं चुनता, बल्कि अपने अनुभव, विवेक और मूल्य के आधार पर कहता है, यह बात कही जानी चाहिए, और इस तरह कही जानी चाहिए।
साहित्य का भविष्य मनुष्य के विवेक में
साहित्य को एआई की चुनौती स्वीकार करनी चाहिए, पर चुनौती का अर्थ उसके आगे आत्मसमर्पण करना नहीं है। एआई को सहायक बनाया जा सकता है, लेखक नहीं। लेखक की कलम तब तक जीवित है, जब तक उसके पीछे जागता हुआ मन, संवेदनशील हृदय और प्रश्न करने वाला विवेक है। मशीन शब्द दे सकती है। उन शब्दों को जीवन का अर्थ देना मनुष्य का काम है। साहित्य का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि एआई कितना लिख सकता है, बल्कि इससे होगा कि मनुष्य अपने भीतर देखने, संसार को समझने और सच को अपनी भाषा में कहने की क्षमता कितनी बचाकर रखता है।
अस्तु
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(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)
