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विरोध को दबाओ मत…सुनो और जवाब दो

सत्ता की जवाबदेही और नागरिकों के विरोध का अधिकार, दोनों ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद हैं। असहमति को दबाने के बजाय सुनना ही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। लोकतंत्र केवल चुनाव कराने, सरकार बनाने और बहुमत के आधार पर शासन चलाने तक सीमित नहीं है। सच्चे लोकतंत्र में सत्ता की जनता के प्रति जवाबदेही बनती है। नागरिकों को अपनी बात कहने, असहमति जताने तथा शांतिपूर्ण विरोध करने की स्वतंत्रता होती है। सत्ता पक्ष का दायित्व जनहित में निर्णय लेना है, जबकि विपक्ष की जिम्मेदारी सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली की समीक्षा करना, कमियों को उजागर करना और सुधार के लिए आवाज उठाना है। यही संतुलन लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखता है। आज चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे है। चुनाव व्यवस्था से जुड़े प्रश्नों का सीधा संबंध जनता के विश्वास, मतदान के अधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता से है। इसलिए ऐसे मुद्दों पर उठने वाली आवाजों को केवल राजनीतिक विरोध मानकर खारिज कर देना उचित नहीं है। सवाल उठाने वालों को चुप कराने की बजाय जवाबदेही होनी चाहिए। दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों पर सख्ती, यातायात और सार्वजनिक परिवहन पर लगाए गए प्रतिबंध तथा प्रदर्शनकारियों की आवाजाही को रोकने से आम लोग भी प्रभावित हो रहे हैं। यह सही है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरुरी है। लेकिन आम नागरिकों की सुरक्षा, सार्वजनिक सुविधाओं की निरंतरता और यातायात का सुचारु संचालन भी जरुरी है। इसीलिए किसी भी प्रतिबंध की आवश्यकता, उसकी सीमा और उसके प्रभाव का आकलन न्यायसंगत तथा आनुपातिक आधार पर होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने भी विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थानों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन पर जोर दिया है। दिल्ली में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो सकें और लोग अपनी बात संबंधित संस्थानों तक पहुंचा सकें। इसके लिए उपयुक्त स्थान, जरूरी सुविधाएं और स्पष्ट नियम निर्धारित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। व्यवस्था ऐसी हो कि अभिव्यक्ति का अधिकार भी न छीना जाए और आम जनजीवन भी चलता रहे। प्रदर्शन शांतिपूर्ण हों, कानून का उल्लंघन न हो और किसी दूसरे नागरिक के अधिकारों का हनन न किया जाए। लेकिन प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून का इस्तेमाल असहमति दबाने के औजार के रूप में न हो। लोकतंत्र में मतदान का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण अपनी बात कहने और सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार भी है। यदि नागरिकों को अपनी शिकायतें सामने रखने के लिए उचित मंच नहीं मिलेगा, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उनका विश्वास कमजोर होगा। इसलिए सरकार और प्रशासन के लिए यह समय आत्ममंथन का है। विरोध को चुनौती नहीं, लोकतांत्रिक संवाद का अवसर समझा जाना चाहिए। मजबूत लोकतंत्र वह नहीं, जहां असहमति की आवाज सुनाई न दे; बल्कि वह है, जहां सबसे तीखे सवालों का जवाब भी संवैधानिक मर्यादा, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ दिया जाए।

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