मुंह में राम, बगल में छूरी।
यह कैसी आई मजबूरी।।
कुर्सी की माया को देखो।
चाह कहां रह गई अधूरी।।
बंधक बनकर बोल रहा है।
लेनी पड़ती है मंजूरी।।
इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढो।
जनता से है कितनी दूरी।।
वह कुबेर के घर का बच्चा।
मांग रहा है दुनिया पूरी।।
अनुशासन वह खत्म कर दिया।
जीते जी कर रहा मजूरी।।
हमने उसका चेहरा देखा।
बार-बार दिखती मजबूरी।।
आंखें लाल-लाल करता है।
लेकिन वे हैं काली-भूरी।।
आपस में कैसे लड़ते हैं।
करते रहते घूरा-घूरी।।
जगत नियंता के घर देखो।
फिर आई कैसी मजबूरी।।
हरिश्चंद्र के वंशज की भी।
चाह आज रह गई अधूरी।।
पागलपन ने सब कुछ खाया।
भीतर घुसकर हलवा-पूरी।।
हमको राशन देते रहना।
बस इतना है बहुत जरूरी।।
मन में राम, बगल में छूरी।
यह कैसी आई मजबूरी।।
-अन्वेषी
