मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृति‘थिएटर ऑफ रेलेवेंस’: मंजुल भारद्वाज का वैकल्पिक रंगकर्म

‘थिएटर ऑफ रेलेवेंस’: मंजुल भारद्वाज का वैकल्पिक रंगकर्म

आगामी 8 से 12 जुलाई के दौरान नासिक, महाराष्ट्र में ‘रंगभूमि : सृजन और संवर्धन’ शीर्षक से पांच दिवसीय आवासीय कार्यशाला आयोजित होने जा रही है। रंगचिंतक मंजुल भारद्वाज के उत्प्रेरण में होने वाली यह कार्यशाला अभिनय सीखने के साथ-साथ रंगमंच की एक ऐसी वैचारिक परंपरा से परिचय का अवसर है, जो रंगकर्म को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के रूपांतरण की प्रक्रिया मानती है। इसी कार्यशाला के बहाने एक बार फिर चर्चा में है—‘थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस’ का दर्शन।
मनुष्य की चेतना का रंगमंच
रंग निर्देशक मंजुल भारद्वाज की मूल स्थापना है कि रंगमंच का असली उद्देश्य दर्शकों का समय काटना नहीं, बल्कि उनकी चेतना को जगाना है। उनके अनुसार सत्ता और बाजार ने कला को मनोरंजन की वस्तु बनाकर उसकी सामाजिक भूमिका को सीमित कर दिया है, जबकि रंगभूमि मनुष्य को उसकी संवेदना, विवेक और प्रकृति से जोड़ती है। इसलिए रंगकर्म मात्र अभिनय, निर्देशन, संगीत या मंच-सज्जा का जोड़ नहीं, बल्कि मनुष्य को अधिक मानवीय बनाने की प्रक्रिया है।
सरकारी अनुदान नहीं, दर्शकों का भरोसा
1992 में शुरू हुआ ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस’ अभियान पिछले लगभग साढ़े तीन दशकों से बिना किसी सरकारी, कॉरपोरेट या राजनीतिक आर्थिक सहायता के निरंतर सक्रिय है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है ‘दर्शक संवाद’। मंजुल मानते हैं कि दर्शक केवल टिकट खरीदने वाला उपभोक्ता नहीं, बल्कि रंगकर्म का सहयात्री है। यही संवाद कलाकार को आत्मनिर्भर बनाता है और रंगमंच का समाज से जीवंत रिश्ता जोड़ता है।
मुद्दों से मुठभेड़ करता रंगकर्म
‘थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस’ के नाटक सामाजिक यथार्थ से सीधे टकराते हैं। जातिवाद, स्त्री अस्मिता, बाल श्रम, जल संकट, किसानों की त्रासदी, घरेलू हिंसा, पर्यावरण, राजनीतिक चेतना और मानवीय गरिमा जैसे विषय उनके नाटकों के केंद्र में हैं। उनका आग्रह है कि कला यदि जीवन को समझने और बदलने की प्रेरणा नहीं देती, तो वह अपने मूल दायित्व से विमुख हो जाती है।
गोवा से नासिक तक
हाल ही में गोवा के कणकवली और मडगांव में आयोजित तीन दिवसीय नाट्य महोत्सव में ‘गर्भ’ और ‘लोक-शास्त्र सावित्री’ जैसी प्रस्तुतियों ने दर्शकों और रंग समीक्षकों का ध्यान आकर्षित किया। गोवा के रंगकर्मियों ने इस रंग-दृष्टि को समकालीन भारतीय रंगमंच की एक गंभीर वैचारिक पहल बताते हुए इसे युवा कलाकारों तक पहुंचाने की आवश्यकता रेखांकित की।
नासिक में होने वाली कार्यशाला इसी रंग-यात्रा की अगली कड़ी है। यह उन लोगों के लिए है, जो रंगमंच को केवल अभिनय की तकनीक नहीं, बल्कि मनुष्य, समाज और समय को समझने की एक सृजनात्मक प्रक्रिया मानते हैं। ऐसे दौर में, जब कला का बड़ा हिस्सा सत्तोन्मुख, बाजार-प्रेमी और प्रचार के दबाव में है, ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस’ यह प्रश्न उठाता है कि क्या रंगमंच मनुष्य को अधिक संवेदनशील, अधिक सजग और अधिक मानवीय बनाने की शक्ति भी रखता है?
-विजयशंकर चतुर्वेदी

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