विवाह करते ही आजीवन
नौकरी में बधती हैं घर की स्त्री
जीरो वेतन में लगातार
काम करती हैं घर की स्त्री
बिना छुट्टी के जीवन भर
चलती हैं घर की स्त्री
बीमार हो एक गोली खा के
काम करती हैं घर की स्त्री
और करती ही क्या हो,
ये सुनती है घर की स्त्री।
बड़ों की जिम्मेदारी, उसके ऊपर
बच्चों की जिम्मेदारी, उसके ऊपर
मेहमानों की जिम्मेदारी, उसके ऊपर
और उसकी जिम्मेदारी, किसी के ऊपर नहीं
फिर भी, वो बहुत खुश है,
ये सबको दिखाती हैं, घर की स्त्री
वो नास्ता न बनाए
तो किसी को नास्ता न मिले।
वो भोजन बनाएं तो किसी भोजन न मिले
वो समान न दे तो किसी को समान न मिले
पर उसने क्या खाया, ये किसी को पता नहीं
फिर भी अन्नपूर्णा बन,
परिवार का पोषण करती हैं घर की स्त्री
मेरे कपड़े प्रेस हुए कि नहीं
बच्चों को टिफिन दिया कि नहीं
पापा को चाय, मिली कि नहीं
पूरा समय, दौड़ते-दौड़ते कब बीत जाता है,
पता ही नहीं चलता।
कभी-कभी काम के बोझ से,
मशीन भी बन जाती हैं घर की स्त्री।
सोचो जिस स्त्री से पूरा संसार चलता है
जिस स्त्री से पूरा परिवार चलता है
यदि वो त्याग पत्र दे दे तो पूरी दुनियां हिल जाय
उसे सम्मान मिलना, तो दूर की बात है
करती ही क्या हो, ऐसे ताने जीवन भर सुनती हैं घर की स्त्री…।
-वंदना मौर्या, इंदौर
