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इलेक्ट्रानिक क्रांति के इस युग में आत्महत्या जैसी घटनाओं में वृद्धि हुई है, जिस पर गंभीर होने की आवश्यकता है: डॉ तुलसी

उमेश गुप्ता/वाराणसी

बुधवार को विश्व आत्म हत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर प्रख्यात मनोचिकित्सक डॉ तुलसी ने कहा कि आज के इस दौर में जहां वैश्वीकरण और भौतिकतावाद में के साथ-साथ लोगों में कम्पटीशन की भावना प्रबल हो रही है, और आगे बढ़ने की होड़ में व्यक्ति के सोच, मूल्यों एवं व्यवहारों में परिवर्तन हो रहा है, वहां एक तरफ तो समाज का विकास होता माना जा सकता है लेकिन वहीं पर इस नये युग के इलेक्ट्रानिक क्रांति के कारण और थोड़े समय में बहुत ज्यादा पैसा कमा लेने की ललक से पूरे विश्व में घबड़ाहट, बेचैनी, अत्यधिक आवेश एवं डिप्रेशन के साथ-साथ एक बहुत ही भयानक समस्या आत्महत्या एवं आत्महत्या के प्रयासों में भी वृद्धि देखी गयी है। आत्म हत्या व आत्मघात की समस्या किसी एक देश या समुदाय की नहीं बल्कि पूरे विश्व की समस्या है। विश्व स्वास्थ संगठन के आकड़े बताते हैं कि प्रत्येक वर्ष लगभग 7 लाख 17 हजार लोग आत्महत्याएं कर लेते हैं। 2022 के ऑकड़े बताते हैं कि लगभग 1 लाख लोगों में 16 पुरुष, 10 महिलाएं एवं 14 से 15 युवा आत्महत्याएं कर ले रहे हैं। आज विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर जरूरी है और हम सभी का एक कर्तव्य हो जाता है कि हम अपने स्तर पर अपने अगल-बगल अपने जान-पहचान में आत्महत्या के प्रयास करने वालों को यथा संभव रोकने का प्रयास करें और इस दुर्लभ “मानव जीवन को बचाने का प्रयास करें।

पिछले 30वर्षों से बतौर एक मनोवैज्ञानिक व मनोचिकित्सक के रूप में मैनें खुद देखा है कि हर महीने लगभग 3 से 5 मरीज अथवा सामान्य युवा मुझसे परामर्श लेने आता है जिनमें आत्महत्या करने का विचार प्रबल हो रहा है या उसने प्रयास किया और बचा लिया गया। आत्महत्या करने से न केवल व्यक्ति अपना जीवन समाप्त करता है बल्कि 37 से 40 व्यक्ति के परिवारों का जीवन तहस-नहस हो जाता है। अगर कारणों के बारे में विवेचना किया जाय तो युवाओं में इसका प्रमुख कारण कम्पटेटिव इंक्जाम, उससे होने वाला तनाव व प्रेम सम्बन्धों से अवसाद, एवं परिवार की चाहत न पूरा कर पाना एवं माता पिता के साथ एक अच्छा व्यवहारिक संवाद न हो पाना है। एक दूसरा कारण बढ़ती हुई घबड़ाहट, अवसाद एवं उ‌द्वेगात्मक समस्याएँ होती हैं। कई आत्महत्याओं के पीछे बेरोजगारी, असुरक्षा एवं गरीबी भी देखी गयी है। खास कर स्त्रियों या बालिकाओं में प्रमुख रूप से पारिवारिक सामजस्य का न होना, शारिरीक शोषण और अपनी बातों को व्यक्त न कर पाना देखा गया है। कभी-कभी इलेक्ट्रानिक क्रांति, मोबाइल एवं टीवी को भी इसका दोषी माना जा सकता है आजकल हर एक व्यक्ति, युवा मोबाइल के ऊपर निर्भर हो गया है और परस्पर आपसी संवाद, परिवार के लोगों से बातचीत खत्म सी होती जा रही है पूरी तरह से मोबाइल निर्भरता एवं मोबाइल गेमिंग के कारण बहुत जल्दी बड़ा नुकसान आर्थिक रूप से एवं सामाजिक रूप हो जाता है जिससे व्यक्ति अपने विवेक एवं आत्मविश्वास को खोकर आत्महत्या कर बैठता है।

इन सब बातों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है किं हम आत्महत्या या आत्महत्या के प्रयासों की रोकथाम बहुत अच्छी तरह से कर सकते हैं, जरूरी है कि हम अपनी चेतना का विस्तार करें और अपने घर परिवार एवं समाज में निम्न बातों की, निम्न मूल्यों का विकास करें। सर्वप्रथम जरूरी है कि युवा वर्ग में स्कूलों कॉलेजों में “कर्म योग की विचार धारा को प्रबल करें, और बच्चों को कर्मयोगी बनाएं। इससे न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा बल्कि आत्म शक्ति के अन्य गुण श्रद्धा, सबुरी एवं सपनों की दुनिया से दूर कर्म प्रधान बनेगें। दूसरा जरूरी है कि बच्चों एवं युवा वर्ग को परिवारों में “सादा जीवन उच्च विचार” की भावना को व्यवहार में लाया जाय। इससे भूल भूत तनाव, और अवसाद में कमी आएगी और व्यक्ति आत्मसंतोषी बनेगा ।

जब आवे संतोष धन सब धन धुलि समान

पारिवारिक विघटन के कारण व्यक्ति बहुत हद तक स्वमुखी होता जा रहा है। आत्महत्या के प्रयासों को रोकने के लिये ” मानव सेवा माधव सेवा” में भी ले आने की कोशिश, बच्चों में एवं परिवारों में करनी चाहिये। अगर बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाना है, तो उनसे संवाद करना, वार्तालाभ करना, उनकी बातों को समझना और अपने व्यवहारों द्वारा उनको ये सिखाना कि हर बात के लिये उनको ‘हाँ’ कहना ही जरूरी नहीं है बल्कि सामाजिक भय के बिना उनको कुछ खास जगहों पर ‘ना’ कहना भी निहायत आवश्यक है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए हम भारतीय समाज में आत्महत्याओं की रोकथाम कर मानसिक स्वास्थ को मजबूत कर सकते हैं

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