मुख्यपृष्ठस्तंभशिलालेख: सृष्टि की सांस हैं वायु देव!

शिलालेख: सृष्टि की सांस हैं वायु देव!

हृदयनारायण दीक्षित / लखनऊ

वायु प्राण है। प्राण नहीं तो जीवन नहीं। वायु अमर देव हैं। उन्हीं की अनुकंपा से बोली भाषा और गान भी है। वायु से आयु है। वे वैदिक ऋषियों के प्यारे देवता हैं। वे प्राणशक्ति के संचालक हैं, लेकिन दिखाई नहीं पड़ते। वैदिक ऋषि वायु की प्रीति में सराबोर हैं। ऋग्वेद के ऋषि बताते हैं ‘इनकी ध्वनि सुनाई पड़ती है, लेकिन रूप नहीं दिखाई पड़ता-घोषा इदस्य शृण्विरे न रूपम्।’ (ऋ० १०.१६८.४) बिल्कुल ठीक कहते हैं, वायु का रूप नहीं होता। वायु की तीव्र गति आती है। अंशों का शोर सुनाई पड़ता है पर वायु का रूप नहीं। लगता है कि ऋषि वायु का रूप देखने के अभिलाषी हैं। वे उन्हें सोम पीने का निमंत्रण देते हैं ‘वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकश्ता-दर्शनीय वायु! आओ सोमरस सजाकर रखा गया है।’ (वही १.२.१) वायु हरेक प्राणी व जीव का प्राण है, लेकिन देवों का प्राण भी वायु ही है ‘आत्मा देवानां।’ (१०.१०.१६८.४) बड़ी बात है देवों को भी मनुष्य जैसा बताना। वायु देवों के भी प्राण हैं इसलिए वही विश्व के राजा हैं। (१०.१६८.२)
भारतीय अनुभूति में सृष्टि पांच महाभूतों (तत्त्वों) से बनी है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पांच महाभूत हैं। इनमें ‘वायु’ को प्रत्यक्ष देव कहा गया है। वायु प्रत्यक्ष देव हैं और प्रत्यक्ष ब्रह्म भी। ऋग्वेद (१.९०.९) में स्तुति है ‘नमस्ते वायवे, त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि, त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। तन्मामवतु-वायु को नमस्कार है, आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं, मैं तुमको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूंगा। आप हमारी रक्षा करें।‘ ऋग्वेद का यही मंत्र यजुर्वेद (३६.९) अथर्ववेद (१९.९.६) व तैत्तिरीय उपनिषद् (१) में भी जस का तस आया है।
ब्रह्म ऋषियों का लाडला विषय है। ब्रह्म संपूर्णता है। आधुनिक ब्रह्माण्ड विज्ञानी भी ब्रह्म में उत्सुक हैं। वह अनुभूत है, प्रयोग सिद्ध है और प्रत्यक्ष है। कहते हैं, ‘वायु ही सभी भुवनों में प्रवेश करता हुआ हरेक रूप रूप में प्रतिरूप होता है-वायुर्थेको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो वभूव:। सभी जीवों में प्राण की सत्ता है, प्राण नहीं तो जीवन नहीं। प्राण वस्तुत: वायु है। ऋषि सूर्य आदित्य को देखते हैं। वे भी प्रत्यक्ष देव हैं। प्रश्नोपनिषद् में कहते हैं ‘आदित्य ह वै प्राण -जो आदित्य है सूर्य हैं, वही प्राण है। मनुष्य पांच तत्वों से बनता है। मृत्यु के समय सभी तत्व अपने-अपने मूल में लौट जाते हैं। ऋग्वेद (१०.१६.३) में स्तुति है ‘तेरी आंखें सूर्य में मिल जायें और आत्मा वायु में।’ तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया ‘अग्नि तत्व अग्नि में जाए और प्राण तत्व वायु में भुव इति वायौ।’ वैदिक पूर्वज वायु को देवता जानते हैं, उन्हें बहुवचन ‘मरुद्गण’ कहते हैं। वे जल को भी एक वचन नहीं कहते, जल उनकी दृष्टि में आप: मातरम् हैं-जलमाताएं हैं। वे संपूर्ण विश्व के प्रति मधु दृष्टि रखते हैं। ऋग्वेद के एक मंत्र में वे वायु को भी मधुरता से भरा पूरा पाना चाहते हैं-मधुवाता ऋतायते। बृहदारण्यक उपनिषद् के सुंदर मंत्र में पृथ्वी और अग्नि के प्रति मधुदृष्टि बताने के बाद वायु के लिए कहते हैं ‘अयं वाय: सर्वेर्षां भूतानां मध्वस्य – यह वायु सभी भूतों का मधु (सभी भूतों के पुष्पों से प्राप्त रस) है और सभी भूत इस वायु के मधु हैं-वायो: सर्वाणि भूतानि मधु। सृष्टि निर्माण के सभी घटक एक दूसरे से अन्तर्संबंधित हैं। वे एक दूसरे के मधु हैं।
मरुद्गण शक्तिशाली देवसमूह हैं, वे रुद्र देव के पुत्र हैं। लेकिन इनके उद्भव का पता लगाना आसान नहीं। ऋग्वेद के ऋषि वशिष्ठ की जिज्ञासा है, ‘एक जैसे तेजस्वी ये मरुद्गण कौन हैं? अपने जन्म के बारे में ये स्वयं जानते हैं, दूसरा कोई नहीं जानता’ (७.५६.१-२) जन्म के बिना परिचय अधूरा है, लेकिन वशिष्ठ के मंत्र में उनकी बाकी बातें जगजाहिर हैं ‘इनकी माता ने इन्हें अंतरिक्ष-उदक में धारण किया था। (वही, ४) वे ऋत-सत्य का आचरण करते हैं। (वही १२) स्वयं तेज चलते हैं, शायद इसीलिए ये तेजी से काम करने वाले लोगों पर जल्दी प्रसन्न होते हैं। (वही, १९)
मरुद्गण समतावादी हैं, धनी, दरिद्र सबको एक समान संरक्षण देते हैं। (वही २०) वशिष्ठ के सूक्तों में इन्हें अति प्राचीन भी बताया गया है ‘हे मरुतों ! आपने हमारे पूर्वजों पर भी बड़ी कृपा की’ (वही, २३) वशिष्ठ की ही तरह ऋग्वेद के एक और ऋषि अगस्त्य मैत्रवरुणि भी मरुद्गणों के प्रति अतिरिक्त जिज्ञासु हैं। पूछते हैं ‘मरुद्गण किस शुभ तत्व से सिंचन करते हैं? कहां से आते हैं? किस बुद्धि से प्रेरित हैं? किसकी स्तुतियां स्वीकार करते हैं? (१.१६५.१-२) फिर मरुतों का स्वभाव बताते हैं ‘वे वर्षणशील मेघों के भीतर गर्जनशील हैं। (१.१६६.१) वे पर्वतों को भी अपनी शब्द ध्वनि से गुंजित करते हैं, राजभवन कांप जाते हैं और जब अंतरिक्ष के पृष्ठ भाग से गुजरते हैं उस समय वृक्ष डर जाते हैं और वनस्पतियां औषधियां तेज रफ्तार रथ पर बैठी महिलाओं की तरह भयग्रस्त हो जाती है। (वही ४, ५) तेज आंधी और पानी का ऐसा काव्य चित्रण अनूठा है। कहते हैं, ‘वे गतिशील मरुद्गण भूमि पर दूर-दूर तक जल बरसाते है। वे सबके मित्र हैं।‘ (१.१६७.४) यहां मरुद्गण वर्षा के देवता हैं तब विद्युत से इनकी मैत्री स्वाभाविक ही है ‘मनुष्यों के चित्त को प्रभावित करने वाली विद्युत ने इनका वरण किया। विद्युत भी इनके रथ पर साथ-साथ चलती है।‘ (वही, ५) वे मनुष्यों को अन्न पोषण देते है। (१.१६९.३)
पहले वायु की तीव्रगति। फिर वर्षा और उससे अन्न। प्रकृति में एक प्रीतिकर यज्ञ चल रहा है। वायु प्राण हैं, अन्न भी प्राण हैं। अन्न का प्राण वर्षा है। वायुदेव/मरुद्गण वर्षा लाते हैं। ऋग्वेद में मरुतों की ढेर सारी स्तुतियां हैं। कहते हैं ‘आपके आगमन पर हम हर्षित होते हैं, स्तुतियां करते हैं।’ (५.५३.५) लेकिन कभी-कभी वायु नहीं चलती, उमस हो जाती है। प्रार्थना है ‘हे मरुतो आप दूरस्थ क्षेत्रों में न रुकें, द्युलोक अंतरिक्ष लोक से यहां आयें।’ (५.५३.८) ऋषि कहते हैं ‘रसा, अनितमा कुभा सिंध आदि नदियां वायु वेग को न रोकें।’ (वही १०) वे नदी के साथ पर्वतों से भी यही अपेक्षा करते हैं। (५.५५.७)
वायु प्रवाह का थमना ऋषियों को अच्छा नहीं लगता। हम सबको भी वायु का प्रवाह अच्छा लगता है। वायु रुकी तो उमस बढ़ती है। कहते हैं ‘हे मरुतो आप रात-दिन लगातार चलें, सभी क्षेत्रों में भ्रमण करें।’ (५.५४.४) ऋषियों का भावबोध गहरा है। वायु प्राण है, वायु जगत् का स्पंदन है। ऋषियों की दृष्टि में वे देवता हैं इसीलिए वायु का प्रदूषण नहीं करना चाहिए। वे जीवन हैं, जीवन दाता भी हैं। वायु से वर्षा है, वायु से वाणी है। कंठ और तालु में वायु संचार की विशेष आवृत्ति ही मंत्र है। गीत-संगीत के प्रवाह का माध्यम वायु हैं। गंध-सुगंध और मानुष गंध के संचरण का उपकरण भी वायु देव हैं। वायु नमस्कारों के योग्य हैं।
वायु देव के अध्ययन और उपासना पर भी हमारे पूर्वजों ने बड़ा परिश्रम किया था। भारतीय दृष्टि में वायु प्रकृति की शक्ति है। उन्होंने वायु का अध्ययन एक पदार्थ की तरह किया है। भारतीय दृष्टि में वे सृष्टि निर्माण के पांच महाभूतों से एक महाभूत हैं, उनका अध्ययन जरूरी है, लेकिन दिव्य शक्ति की तरह उनको प्रणाम भी किया जाना चाहिए। ऋग्वेद के ऋषि मरुद्गणों का जन्म, स्वभाव वर्षा लाने का उनका काम ठीक से जानना चाहते हैं, लेकिन नमस्कारों के साथ। यूरोपीय विद्वान सूर्य का भी अध्ययन कर रहे हैं, भारतीय ऋषि सूर्य का अध्ययन उनसे ज्यादा कर चुके हैं। सूर्य यहां देवता हैं, तेजोमय सविता हैं, सो ‘तत्सवितुर्वरेण्य’ है।
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