मुख्यपृष्ठस्तंभअंदर की बात : जीडीपी की उड़ान जनता परेशान

अंदर की बात : जीडीपी की उड़ान जनता परेशान

राजन पारकर

देश विकास की तेज रफ्तार से दौड़ रहा है-ऐसा चित्र लगातार प्रस्तुत किया जा रहा है। जीडीपी बढ़ रही है, निवेश बढ़ रहा है, बुनियादा ढांचे को गति मिल रही है और अब मुंबई-पुणे बुलेट ट्रेन की घोषणा भी हो गई है। यानी ऐसा लगता है मानो देश ने विकास का एक्सप्रेसवे पकड़ लिया हो!
लेकिन इस चमकदार तस्वीर के बीच एक छोटा-सा, बल्कि बहुत बड़ा सवाल कोई पूछेगा या नहीं-इस विकास की रफ्तार का लाभ आम आदमी के जीवन में आखिर कितना दिखाई दे रहा है?
भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भारत की जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों को लेकर जो सवाल उठाए हैं, वे इसी कारण महत्वपूर्ण हैं। यदि अर्थव्यवस्था वास्तव में इतनी तेज गति से बढ़ रही है तो पर्याप्त रोजगार क्यों पैदा नहीं हो रहे? निजी निवेश अपेक्षित गति से क्यों नहीं बढ़ रहा? उद्योगपति निवेश करने से क्यों हिचक रहे हैं? बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई क्यों नहीं आ रहा? ये प्रश्न उन्होंने उठाए हैं। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि जीडीपी का आंकड़ा जितना बड़ा दिखाई दे रहा है, रोजगार का आंकड़ा उतना ही छोटा क्यों दिखाई देता है-इस पर अब बंद कमरों में भी चर्चा होने लगी है। क्योंकि अर्थव्यवस्था की वास्तविक ताकत केवल आंकड़ों में नहीं होती; वह रोजगार, आमदनी और नागरिकों की क्रयशक्ति में दिखाई देती है। जीडीपी बढ़ गया और युवा को नौकरी नहीं मिली, तो उस विकास का उत्सव आखिर किसके लिए? शेयर बाजार ऊपर चला गया, इसका अर्थ यह नहीं कि हर घर की आय बढ़ गई। किसी बड़े उद्योग ने हजारों करोड़ रुपए के निवेश की घोषणा कर दी, इसका अर्थ यह नहीं कि हर शिक्षित युवा के हाथ में नियुक्ति-पत्र आ गया। निवेश सम्मेलन में करोड़ों-अरबों की घोषणाएं हो गईं, इसका अर्थ यह भी नहीं कि अगले दिन कारखाने का दरवाजा खुल जाएगा। बेशक, सरकार के हर आंकड़े पर संदेह करना उचित नहीं है। लेकिन सवाल पूछना लोकतंत्र में अपराध भी नहीं है। बल्कि यदि सरकारी आंकड़ों और जमीन पर दिखाई देने वाली वास्तविकता के बीच अंतर दिखाई दे रहा हो, तो उस अंतर की पड़ताल करना ही स्वस्थ अर्थव्यवस्था की पहली कसौटी है।
मुंबई-पुणे बुलेट ट्रेन
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मुंबई-पुणे के बीच बुलेट ट्रेन कॉरिडोर की घोषणा की है। मुंबईकर पुणे में भाकरवड़ी खाएंगे और पुणेकर मुंबई में वड़ा-पाव खाएंगे-इस कल्पना ने घोषणा में मनोरंजन का स्वाद भी जोड़ दिया है। इसके साथ मुंबई के लिए २३८ नई एसी लोकल ट्रेनों को मंजूरी तथा २०२७ तक पहली एसी लोकल चलने की जानकारी भी सामने आई है। यदि ये परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं तो निश्चित रूप से उनका स्वागत किया जाना चाहिए। यात्रा का समय कम होना, बेहतर सुविधाएं मिलना और आधुनिक परिवहन व्यवस्था तैयार होना अच्छी बात है।
लेकिन मुंबईकर का सवाल बिल्कुल सीधा है बुलेट ट्रेन दौड़ने से पहले मुंबई की रोज की लोकल थोड़ी अधिक मानवीय सुविधा के साथ दौड़ेगी क्या?
एसी लोकल आ जाएगी, लेकिन प्लेटफॉर्म पर उमड़ती भीड़ का क्या? सड़कों पर लगने वाले जाम का क्या? बारिश में जलभराव का क्या? गड्ढों का क्या? लगातार महंगा होता घर का सपना, बढ़ता किराया और बढ़ता यात्रा खर्च-इन सवालों का जवाब भी क्या बुलेट ट्रेन की रफ्तार से मिलेगा? राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि घोषणाओं की रफ्तार और उनके क्रियान्वयन की रफ्तार के बीच का अंतर जितना कम होगा, विकास का वास्तविक अर्थ उतनी ही जल्दी जनता को समझ आएगा। क्योंकि जीडीपी की रफ्तार कागज पर, विमान की रफ्तार आकाश में और बुलेट ट्रेन की रफ्तार भविष्य में हो सकती है; लेकिन आम आदमी के जीवन की रफ्तार आज तय होती है। उसे रोजगार चाहिए। उसे सस्ता और सम्मानजनक आवास चाहिए। उसे सुरक्षित और सुविधाजनक यात्रा चाहिए।
उसे अच्छे रास्ते, पर्याप्त पानी, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए। इसलिए विकास की बड़ी-बड़ी घोषणाएं करते समय एक सवाल कभी नहीं भूलना चाहिए देश दौड़ रहा है, यह अच्छी बात है; लेकिन इस दौड़ में आम आदमी पीछे तो नहीं छूट रहा?’

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