मुख्यपृष्ठस्तंभअंदर की बात: आंदोलनों की आहट और सत्ता के गलियारों की बेचैनी

अंदर की बात: आंदोलनों की आहट और सत्ता के गलियारों की बेचैनी

राजन पारकर

यू-टर्न की राजनीति
राजनीति में सिद्धांत अब मौसम की तरह बदलने लगे हैं। कल तक जिस पीढ़ी को ‘गटर’ कहा जा रहा था, आज वही देश का भविष्य बन गई। जिन छात्र आंदोलनों को हल्के में लिया गया, उन्हीं की गूंज सत्ता के दरवाजों तक पहुंची। उधर महाराष्ट्र में आरक्षण की राजनीति फिर उबाल पर है और बयानबाजी के बीच सत्ता के भीतर की खामोशी कई सवाल खड़े कर रही है।
राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि आने वाले दिनों में सिर्फ विपक्ष ही नहीं, सत्ता पक्ष के भीतर भी समीकरण बदल सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, कुछ नेताओं की नाराजगी बढ़ रही है, कुछ टिकटों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं और कुछ अफसरों की कुर्सियां भी चर्चा का विषय बनी हुई हैं। जनता के सवाल वहीं हैं, लेकिन राजनीति का मंच अब संवाद से ज्यादा अवसरवाद का अखाड़ा बनता दिखाई दे रहा है।
गटर से देश के भविष्य तक… इतनी तेज पलटी
तो गिरगिट भी शर्मा जाए!
कल तक जो युवा ‘गटर की पीढ़ी’ थे, आज अचानक वही भारत का भविष्य बन गए। राजनीति में इसे विचार परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता की दिशा देखकर लिया गया यू-टर्न कहा जाता है।
संघ प्रमुख ने युवाओं पर भरोसा जताया, तो देखते-देखते राजनीतिक सुर भी बदल गए। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अब युवा मतदाता किसी भी दल के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी बन चुके हैं। ऐसे में कल तक जिन पर शब्दों के पत्थर फेंके जा रहे थे, आज उन्हीं पर फूल बरसाना मजबूरी बन गया है। राजनीति में याददाश्त सबसे पहले मरती है। आज वही दृश्य फिर दिखाई दे रहा है। सवाल यह नहीं कि किसी ने अपनी राय बदली, सवाल यह है कि क्या जनता इतनी भोली है कि कल की गाली और आज की तारीफ के बीच का फर्क भूल जाएगी? सूत्रों के अनुसार, सत्ता के रणनीतिकारों ने साफ संकेत दिया है कि युवाओं को नाराज करना अब राजनीतिक आत्मघात होगा। इसलिए बयान भी बदले, भाषा भी बदली और चेहरे के भाव भी बदल गए। लेकिन जनता के मन में सवाल वही है, क्या बदली हुई सोच दिल से आई है या चुनावी गणित से?
जंतर-मंतर की गूंज, सत्ता की दीवारें
आखिर हिल ही गईं!
राकेश टिवैâत का बयान केवल एक आंदोलन का बखान नहीं, बल्कि सत्ता को आई चेतावनी का दस्तावेज माना जा रहा है। उन्होंने साफ संकेत दिया कि दिल्ली सिर्फ वही आवाज सुनती है, जो सड़कों पर गूंजती है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि छात्र आंदोलन ने सत्ता के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी थी। पहले आंदोलन को नजरअंदाज किया गया, फिर लाठी चली और आखिरकार वही सरकार झुकती नजर आई। इतिहास गवाह है कि जब युवा और किसान एक सुर में बोलते हैं, तब सिंहासन की नींव भी कांपती है। सूत्रों के अनुसार, किसान संगठनों और छात्र समूहों के बीच बढ़ता संवाद आने वाले दिनों में नई राजनीतिक चुनौती बन सकता है। यही वजह है कि मंत्रालयों में बैठकों का दौर तेज होने की चर्चा है। सवाल सिर्फ इतना है कि सरकार आंदोलनों से सबक लेगी या फिर हर बार जनता को सड़क पर उतरने के बाद ही उसकी आवाज सुनी जाएगी?
असली लड़ाई आरक्षण की या राजनीतिक वर्चस्व की?
महाराष्ट्र की राजनीति में आरक्षण अब केवल सामाजिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। मनोज जरांगे और गुणरत्न सदावर्ते के बीच चल रही जुबानी जंग ने सत्ता की बेचैनी और बढ़ा दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सरकार दो पाटों के बीच फंसी हुई है। एक तरफ आंदोलन का दबाव है, तो दूसरी तरफ अपने ही समर्थक वर्ग की नाराजगी। ऐसे में हर बयान सरकार के लिए नई मुश्किल खड़ी कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, सत्ता के भीतर भी इस मुद्दे पर एक राय नहीं है। कौन किसके साथ है और कौन सिर्फ समय काट रहा है, इसकी चर्चा मंत्रालय से लेकर पार्टी कार्यालयों तक सुनाई दे रही है।

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