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थका-थका कर खदेड़ रहा ईरान!… अमेरिका को खित्ते में तोड़ डालने की तैयारी

मुस्लिम वर्ल्ड
सूफी खान
ईरान ने तय कर लिया है कि मिडिल ईस्ट में अब अमेरिका का एक भी फौजी अड्डा रहने नहीं देना है। आगे चलकर भले ही अमेरिका ईरान से समझौता कर ले, लेकिन खित्ते में अमेरिका नहीं रहेगा। इसी फलसफे पर हर दिन काम कर रहा है ईरान। उसके लिए एक खास रणनीति भी अपना रहा है। मकसद है अरब देशों से अमेरिका को इस कदर खाली कर दो कि एक दिन वो खुद सामान समेटने पर मजबूर हो जाए। हाल ही में लारक आयलैंड और फिर होर्मुज के पास एक शादी वाले घर पर अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान ने जिस हिकमत के तहत वार किए हैं, वो चर्चा का सबब बन गया है। जी हां, ईरान मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर सिर्फ मिसाइल ही नहीं दाग रहा, बल्कि अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम की कमजोरी को दुनिया के सामने भी ला रहा है।
जॉर्डन और यूएई में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर अपने पलटवार में ईरान में आईआरजीसी ने पहले एक के बाद एक बैलेस्टिक मिसाइलों की वेव भेजी, ताकि जार्डन में मौजूद अमेरिकी पेट्रीयाट सिस्टम लगातार जवाबी फायर करते रहें। अमेरिका को लगा कि ईरान की मिसाइलें आ रही हैं इन्हे रास्ते में ही उड़ा कर रख दो फिर जब ईरान को लगा कि अब अमेरिकी एयरडिफेंस के इंटरसेप्टर्स कम हो चुके हैं, तब उसने निकाली खैबर शिकन मिसाइल। खैबर शिकन जिसके मायने ही हैं खैबर के किले को फतेह करने वाला। यानी हजरत अली।
बताया जा रहा है कि जॉर्डन और पर्शियन गल्फ पर मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर ईरान ने ये अटैक कई स्टेजेस में किए। पहली स्टेज में ईरान ने बड़ी तादाद में लिकविड फ्यूल मिसाइल लांच की। ये बड़ी नॉर्मल मिसाइलें थीं, जिनका मकसद टार्गेट को हिट करना नहीं था। दरअसल, ईरान ने इन मिसाइलों के जरिए जॉर्डन में तैनात यूएस आर्मी के डिफेंस सिस्टम की बैटरी को बार-बार इंगेज कर थका डालने का प्लान बनाया था। ताकि उसमें जो इंटरसेप्टर मिसाइल लगती हैं, वो लगातार खर्च होती चली जाए।
इसके बाद खैबर-शेकन मिसाइलें दागी गर्इं, ये मिसाइलें कई जगहों से दागी गर्इं, जिनमें ईरान में खोमेन, यज्द, करमनशाह और बिदगानेह के आसपास के इलाके शामिल हैं। खैबर-शेकन का मैन्युवरेबल री-एंट्री व्हीकल इंटरसेप्शन को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना देता है।
खास बात ये है कि जब आखिरी दो खैबर शिकन जॉर्डन की तरफ दागी गर्इं तो उनके खिलाफ अमेरिका का जीरो एयरडिफेंस देखने के लिए मिला। यानी इंटरसेप्टर्स खत्म हो चुके थे। अब सोशल मीडिया पर कई लोग चर्चा करते हैं कि क्या अमेरिका को इतनी अहम बात पता नहीं होती। जो वो ईरान की रणनीति का शिकार हो गया। तो इस पर एक्सपर्ट कहते हैं कि अमेरिका को सब पता होता है, लेकिन दिक्कत ये है कि उसके पास कोई ऑप्शन नहीं है। मिसाइल चाहे छोटी हो या बड़ी, उसे रोकना तो पड़ेगा ही और उसमें हर बार इंटरसेप्टर मिसाइल लगती है, क्यों कि अगर छोटी मिसाइल भी गिर जाए तो नुकसान होता ही होता है।
खास बात तो ये है कि ईरान ने इस मिसाइल का इस्तेमाल किश्तों में और बेहद सोच समझ कर किया है। इससे पहले ईरान ने इजरायल पर किए गए अपने बड़े मिसाइल हमलों के दौरान खैबर शिकन मिसाइल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था। इसके अलावा ४० दिनों की जंग के दौरान ईरान ने अमेरिकी और इजराइली ठिकानों के खिलाफ मिसाइल हमलों की कई लहरें चलाई हैं।
ईरान अपने दुश्मनो को बुरी तरह थकाने और तबाह करने की रणनीति पर उतर आया है। ईरान मिडिल ईस्ट में अमेरिका के हाथ-पैर तोड़ देना चाहता है। ताकि वो ईरान पर हमले की की ताकत ही ना जुटा पाए। कहा जा रहा है कि ईरान की १५ हजार मिसाले तैयार हैं।

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