मुख्यपृष्ठनए समाचार‘हर संबंध का अंत विवाह में ही हो, यह जरूरी नहीं!’

‘हर संबंध का अंत विवाह में ही हो, यह जरूरी नहीं!’

-शारीरिक संबंधों के आधार पर चरित्र पर सवाल नहीं उठाया जा सकता

-सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

सामना संवाददाता / मुंबई

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि आपसी सहमति से विवाह से पहले शारीरिक संबंध रखने वाले अविवाहित वयस्कों को संदिग्ध चरित्र वाला नहीं माना जा सकता। आधुनिक समाज में ऐसे संबंधों की संख्या बढ़ रही है और इन पर कोई कानूनी रोक नहीं है। केवल ऐसे संबंधों के आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में नकारात्मक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने अपने पैâसले में कहा कि पुलिस और सेना जैसी सेवाओं में भर्ती के दौरान उम्मीदवार के चरित्र का परीक्षण महत्वपूर्ण होता है, लेकिन यह जांच व्यक्तिगत नैतिक मानदंडों के आधार पर नहीं की जा सकती। यह देखा जाना चाहिए कि उम्मीदवार के व्यवहार में अपराधी प्रवृत्ति, बेईमानी, हिंसक स्वभाव या सार्वजनिक सेवा के लिए अनुपयुक्त गुण तो नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान समाज में अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से संबंध बनना सामान्य होता जा रहा है। जब ऐसे संबंधों पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है, तब केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र पर संदेह नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने अपने पैâसले में कहा, ‘दो अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध किसी व्यक्ति के चरित्र का पैमाना नहीं हो सकते। कानून कहीं भी ऐसे संबंधों को अवैध नहीं मानता। इसलिए केवल ऐसे संबंधों के आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में नकारात्मक निष्कर्ष निकालना गलत होगा।’
पुलिस भर्ती के उम्मीदवार को राहत
यह मामला तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती मंडल द्वारा एक चयनित उम्मीदवार की नियुक्ति रद्द किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवार की अपील स्वीकार करते हुए उसे नियुक्ति देने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती मंडल के इस दृष्टिकोण को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि समझौते को अपराध स्वीकार करने के बराबर मानना पूरी तरह निराधार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस निष्कर्ष को ‘पूरी तरह विकृत और तर्कहीन’ बताया।

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