मनमोहन सिंह
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक नया थ्रिलर ड्रामा चल रहा है, जिसका नाम है, ‘नीट का रायता और कट्टर वोटर का दर्द’!
यूपी के कोर भाजपाइयों की हालत इस वक्त उस आशिक जैसी हो गई है, जिसे महबूबा से प्यार तो बेइंतहा है, पर उसकी रोज-रोज की फरमाइशों ने बैंक बैलेंस जीरो कर दिया है। यूपी के अमरोहा से लेकर कानपुर तक के लोग सीना ठोककर कह रहे हैं, ‘भाईसाहब, हम कट्टर तो हैं, लेकिन, ये पेपर लीक वाला…’
जनता का मूड इस वक्त बड़ा ही सतरंगी है। योगी जी के बुलडोजर एक्शन और कानून-व्यवस्था के लोग कभी हां, कभी ना के मूड में हैं, लेकिन जैसे ही बात सरकारी नौकरी या नीट परीक्षा की आती है, युवाओं की ‘कूल’ सिचुएशन तुरंत ‘क्रिटिकल’ हो जाती है। एक चाचा ने तो चाय की टपरी पर ज्ञान दे डाला, ‘सड़कें तो इतनी चकाचक बन गई हैं कि दिल खुश हो जाए, पर उन सड़कों पर दौड़ने वाले हमारे लड़के बिना परीक्षा के ही ‘आउट ऑफ सिलेबस’ हुए जा रहे हैं!’
मजेदार बात यह है कि ‘तुम रूठे रहो, हम मनाते रहेंगे’ अंदाज में इस महा-नाराजगी के बाद भी समाजवादी पार्टी वाले कोने में खड़े होकर मंद-मंद मुस्कुरा तो रहे हैं, पर जनता पर डोरे डाल रहे हैं… लेकिन जनता पूरी तरह मूड में नहीं दिख रही। वोटर का कहना है, ‘नाराज हम सरकार से हैं, इसका मतलब ये थोड़ी कि हम पुरानी साइकिल पर बैठ जाएंगे? वहां तो चेन उतरने का डर अलग रहता है पहले भरोसा तो बना बाबू!’ यानी अखिलेश बाबू की तरफ झुकाव अभी भी ‘लोडिंग…’ पर ही अटका हुआ है।
कुल मिलाकर, यूपी की ५०-५० जनता सरकार से ‘मीठी नाराजगी’ जता रही है। वो चाहती है कि सरकार विकास का नेशनल हाईवे तो दिखाए, पर गली के गड्ढे और परीक्षा के पर्चे भी संभाल कर रखे। अब देखना यह है कि भाजपा अपने इन ‘कट्टर’ मगर ‘पेपर लीक से त्रस्त’ प्रेमियों को मनाने के लिए कौन सा नया चुनावी ‘लव लेटर’ लिखती है! वरना वह भी जानती है की पलड़ा बदलते वक्त नहीं लगता।
