मुख्यपृष्ठस्तंभजमीनी अर्थव्यवस्था की खामोशी

जमीनी अर्थव्यवस्था की खामोशी

पॉलिटिका : के.पी. मलिक

भारत का मुख्यधारा मीडिया आखिर अपनी विश्वसनीयता क्यों खोता जा रहा है, इसका ताजा उदाहरण जीडीपी के ७.८ फीसदी वृद्धि दर के आंकड़ों पर दिखाई दे रहा है। पिछले दो दिनों से देश का एक बड़ा हिस्सा ऐसा माहौल बना रहा है मानो भारतीय अर्थव्यवस्था अभूतपूर्व समृद्धि के दौर में प्रवेश कर चुकी हो। टीवी स्टूडियो से लेकर अखबारों के संपादकीय पन्नों तक, हर जगह `७.८ फीसदी ग्रोथ’ का विजयगान सुनाई दे रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर भी उतनी ही चमकदार है, जितनी सरकारी आंकड़ों और मीडिया की सुर्खियों में दिखाई जा रही है?
भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च २०२६ के अंत तक भारत का कुल विदेशी कर्ज ७६२.८ अरब डॉलर, यानी लगभग ७२.१५ लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुका था। दूसरी ओर केंद्र सरकार के बजटीय आंकड़े बताते हैं कि देश हर वर्ष अपने कर्ज पर लगभग १२.७ से १३ लाख करोड़ रुपए तक केवल ब्याज के रूप में चुका रहा है। यह राशि कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग ३७ से ४० फीसदी है। अर्थात सरकार की कमाई का एक बड़ा हिस्सा विकास कार्यों में नहीं, बल्कि पुराने कर्जों का ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा है।
ऐसे समय में जब वित्त वर्ष २०२७ की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर ७.८ फीसदी बताई जा रही है, अर्थव्यवस्था के कई महत्वपूर्ण क्षेत्र इसके विपरीत संकेत दे रहे हैं। अगस्त २०२६ में मैन्युपैâक्चरिंग पीएमआई घटकर ५२.८ पर आ गया, जो पिछले पांच वर्षों की सबसे धीमी गति मानी जा रही है। जुलाई में यही आंकड़ा ५३.५ था। यदि उत्पादन क्षेत्र की गति धीमी पड़ रही है, तो फिर यह तेज आर्थिक वृद्धि आखिर किस आधार पर खड़ी है?
विदेशी निवेशकों का व्यवहार भी कई सवाल खड़े करता है। यदि भारत दुनिया की सबसे आकर्षक अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन चुका है, तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक लगातार बाजार से पैसा क्यों निकाल रहे हैं? मार्च २०२६ में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से १.१७ लाख करोड़ रुपये से अधिक निकाले। इसके बाद अप्रैल में ६०,८४७ करोड़, मई में ३२,९६३ करोड़ और जून में ४९,३४० करोड़ रुपये की निकासी हुई। यह रुझान उस उत्साह से मेल नहीं खाता जो जीडीपी आंकड़ों के आधार पर प्रस्तुत किया जा रहा है। रोजगार की स्थिति भी उतनी उत्साहजनक नहीं दिखती। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, मई-जून २०२६ में बेरोजगारी दर बढ़कर ५.५ फीसदी तक पहुंच गई, जो पिछले ११ महीनों का उच्चतम स्तर था। दूसरी ओर नौकरियों का बड़ा हिस्सा स्थायी रोजगार के बजाय संविदा और आउटसोर्सिंग व्यवस्था में बदलता जा रहा है। प्रोफेसर से लेकर इंजीनियर, वैज्ञानिक से लेकर क्लर्क तक, बड़ी संख्या में लोग अस्थायी रोजगार व्यवस्था के अंतर्गत काम कर रहे हैं।
केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में नियमित कर्मचारियों की संख्या लगभग ४८ से ५० लाख के बीच मानी जाती है, लेकिन इनके साथ काम करने वाले संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों का कोई समेकित और पारदर्शी सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। राज्यों में भी स्थिति अलग नहीं है। हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में समय-समय पर सामने आने वाले आंकड़े बताते हैं कि लाखों कर्मचारी संविदा व्यवस्था पर निर्भर हैं। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) तथा अन्य श्रम अध्ययनों के अनुसार मैन्युपैâक्चरिंग क्षेत्र में लगभग ४०.२ फीसदी श्रमिक संविदा आधार पर कार्यरत हैं। कोयला क्षेत्र में यह अनुपात लगभग ४५ फीसदी तक पहुंच जाता है।

बिजली उत्पादन और वितरण से जुड़ी इकाइयों में भी करीब १२ लाख संविदा कर्मचारी कार्यरत बताए जाते हैं। सवाल यह है कि यदि आर्थिक विकास इतना मजबूत है, तो रोजगार की गुणवत्ता लगातार कमजोर क्यों होती जा रही है?
भारत-चीन व्यापार संबंधों की तस्वीर भी चिंताजनक है। वर्ष २०२६ के पहले छह महीनों में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार ९१.७२ अरब डॉलर रहा, लेकिन इसी अवधि में भारत को ६७.१ अरब डॉलर का भारी व्यापार घाटा उठाना पड़ा। यह दर्शाता है कि दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के दावे के बावजूद भारत अभी भी विनिर्माण और तकनीकी आत्मनिर्भरता के मोर्चे पर गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।
स्थिति केवल नागरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। रक्षा क्षेत्र में भी हजारों पद खाली पड़े हैं। भारतीय वायुसेना में ७,०३१ पद रिक्त हैं, जबकि थल सेना में जेसीओ और अन्य रैंकों के १,२७,६७३ पद खाली बताए जाते हैं। भारतीय नौसेना भी १,७७७ अधिकारियों सहित १०,८९६ कर्मियों की कमी से जूझ रही है। यदि अर्थव्यवस्था वास्तव में इतनी मजबूत है, तो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इन महत्वपूर्ण पदों को भरने में इतनी देरी क्यों हो रही है?
विमानन क्षेत्र भी दबाव में है। रेटिंग एजेंसी आईसीआरए के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में भारतीय विमानन उद्योग को लगभग १.८ लाख करोड़ रुपए के शुद्ध घाटे का सामना करना पड़ सकता है। कृषि क्षेत्र की तस्वीर भी उत्साहजनक नहीं है। वित्त वर्ष २०२५-२६ में कृषि वृद्धि दर लगभग ४ फीसदी रहने का अनुमान है, जबकि पिछले वर्ष यह ४.६ फीसदी थी। नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद के मुताबिक, भी वित्त वर्ष की शुरुआती दो तिमाहियों में कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर अपेक्षाकृत कमजोर रही।
शेयर बाजार को अक्सर अर्थव्यवस्था का अग्रिम संकेतक माना जाता है, लेकिन यहां भी तस्वीर मिश्रित है। वैश्विक फंड प्रबंधकों के बीच भारतीय बाजार की लोकप्रियता में गिरावट दर्ज की गई है। कुछ अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों में भारत को एशिया के कम पसंदीदा बाजारों में गिना जाने लगा है। वहीं रुपये पर दबाव लगातार बना हुआ है। जुलाई २०२६ में रुपए की गिरावट को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को एक ही दिन में लगभग ७ अरब डॉलर बाजार में झोंकने पड़े।
इन सभी तथ्यों को सामने रखकर देखा जाए तो सवाल जीडीपी के आंकड़े पर नहीं, बल्कि उसकी व्याख्या पर खड़ा होता है। यदि ७.८ फीसदी की वृद्धि वास्तव में व्यापक आर्थिक समृद्धि का संकेत है, तो उसका प्रभाव रोजगार, निवेश, विनिर्माण, कृषि, रक्षा भर्ती, व्यापार संतुलन और आम नागरिक की आय में भी दिखाई देना चाहिए। लेकिन जब इन अधिकांश क्षेत्रों से मिश्रित या नकारात्मक संकेत मिल रहे हों, तब केवल एक आंकड़े को राष्ट्रीय उपलब्धि का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करना अधूरी तस्वीर दिखाने जैसा है।
आर्थिक विकास का वास्तविक अर्थ केवल जीडीपी की ऊंची दर नहीं होता। उसका अर्थ है बेहतर नौकरियां, मजबूत उत्पादन, संतुलित व्यापार, स्थिर मुद्रा, बढ़ती आय और आम नागरिक के जीवन में महसूस होने वाला सुधार। जब तक ये संकेतक समान रूप से मजबूत नहीं दिखते, तब तक ७.८ फीसदी की ग्रोथ पर बजने वाला ढोल कई लोगों को केवल एक सांख्यिकीय उत्सव ही प्रतीत होगा, आर्थिक समृद्धि का प्रमाण नहीं।

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