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मुंबई में गूंजी कजरी की ‘बयार’, सावन के सुरों ने जगाई गांव की याद

महानगर की भागदौड़ के बीच लोकसंस्कृति का जोरदार रंग; नई पीढ़ी को अपनी मिट्टी और परंपरा से जोड़ने का संदेश

सामना संवाददाता / मुंबई

मुंबई की तेज रफ्तार जिंदगी में जहां गांव की मिट्टी, सावन की फुहार और लोकगीतों की मिठास कहीं पीछे छूटती जा रही है, वहीं दहिसर पूर्व में सजे ‘कजरी बयार’ कार्यक्रम ने महानगर में गांव की संस्कृति और लोकपरंपरा की यादें ताजा कर दीं। बयार मित्र परिवार की ओर से क्रिस्टल प्राइड हॉल, आर्किड प्लाजा में आयोजित इस कार्यक्रम में कजरी के लोकसुरों से लेकर पारंपरिक श्रृंगार तक पूर्वांचल की सांस्कृतिक झलक देखने को मिली।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रेम शुक्ल ने कजरी आयोजन की परंपरा और उसके पीछे की सोच को साझा किया। उन्होंने कहा कि मुंबई जैसे महानगर में लोकसंस्कृति को जीवित रखने वाले आयोजनों की जरूरत है। उन्होंने तीज के अवसर पर भी इसी तरह के कार्यक्रम आयोजित करने का सुझाव दिया, ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे।

श्री सिद्धिविनायक मंदिर, मुंबई के कोषाध्यक्ष और भाजपा नेता आचार्य पवन त्रिपाठी ने सनातन एवं भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन पर जोर देते हुए कहा कि लोक परंपराएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान की मजबूत कड़ी हैं।

कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. राधेश्याम तिवारी का जन्मदिन भी मनाया गया। लोकगायिका अंजलि पाठक ‘अंजल’ और गायक शशिकांत मिश्रा ने कजरी और पारंपरिक लोकगीतों की प्रस्तुतियों से माहौल में ऐसा रंग घोला कि दर्शक देर तक झूमते रहे। सावन, प्रेम, विरह और गांव के जीवन से जुड़े गीतों ने मुंबई में बसे लोगों को अपनी जन्मभूमि की याद दिला दी।

कार्यक्रम की खासियत केवल लोकगीत नहीं रही। महिलाओं के लिए महावर (आलता) और चूड़ियों की विशेष व्यवस्था की गई थी। पारंपरिक परिधान और श्रृंगार में पहुंचीं महिलाओं ने आयोजन स्थल को मानो गांव की चौपाल में बदल दिया।

‘कजरी बयार’ ने यह संदेश भी दिया कि महानगर की चकाचौंध के बीच अपनी लोकभाषा, लोकगीत और परंपराओं को बचाए रखना केवल बुजुर्गों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नई पीढ़ी की भी जिम्मेदारी है। मुंबई में गूंजे कजरी के सुरों ने साबित किया कि मिट्टी से जुड़ी संस्कृति दूरी से नहीं, दिल से जीवित रहती है।

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