मुख्यपृष्ठस्तंभहल्का-फुल्का: कजरा ‘मोहब्बत' वाला...!

हल्का-फुल्का: कजरा ‘मोहब्बत’ वाला…!

एम एम एस

‘कजरा मोहब्बत वाला अंखियों में ऐसा डाला, कजरे ने ले ली मेरी जान…’ यह गीत जब कानों में रस घोलता है, तो दिल में मोहब्बत का ऐसा तूफान उठता है कि क्या कहिए! वैसे कजरे की बात छिड़ी है तो हिंदुस्तान का जिक्र लाजमी है, जहां सदियों से काजल बड़े सलीके और पाकीजगी से बनाया जाता है। आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा भी मानती है कि नीम, तुलसी या बादाम के दीए से सहेजा गया यह कजरा आंखों को ठंडक पहुंचाता है। बिल्कुल पहुंचाता है! और यही ठंडक जब आंखों के रास्ते दिल में उतरती है, तो इश्क में डूबे मजनू के तपते जिगर को भी सुकून मिल जाता है।
लेकिन ठहरिए! अगर इसी बीच मजनू को यह बता दिया जाए कि दुनिया में एक ऐसी जगह भी है जहां काजल दीए की लौ से नहीं, बल्कि शार्क मछली के जिगर से बनता है, तो आशिकों के जिगर की ठंडक तो काफूर ही हो जाएगी!
जी हां, ओमान के सुदूर मसीरा द्वीप पर वहां की महिलाएं सदियों से एक अनोखा और बेहद महंगा काजल बना रही हैं। इसके लिए शार्क के जिगर से पारंपरिक तरीके से तेल निकाला जाता है, फिर बिना किसी केमिकल या मशीन के, सिर्फ हाथों की कारीगरी से इसे गहरे काले सुरमे में बदला जाता है। वहां के लोग दावा करते हैं कि यह आंखों को गजब की ठंडक और संक्रमण से सुरक्षा देता है।
अब सोचिए, जो आशिक अपनी महबूबा की आंखों में डूबकर कसीदे पढ़ रहा हो, उसे अचानक पता चले कि उन कातिल निगाहों की चमक के पीछे समंदर के शार्क का जिगर धड़क रहा है तो उस बेचारे के नाजुक दिल पर क्या गुजरेगी? एक तरफ सदियों पुरानी यह अनूठी सांस्कृतिक परंपरा है तो दूसरी तरफ आज का ‘क्रूरता-मुक्त’ जमाना, जहां शार्क के जिगर की बात सुनकर ही अच्छे-अच्छे सूरमाओं का दिल बैठ जाए।
यकीनन, मसीरा द्वीप का यह काजल नायाब है, लेकिन हमारे देसी मजनू तो यही दुआ करेंगे कि उनकी लैला के लिए हिंदुस्तान के सलीके वाला कजरा ही बेहतर है, ताकि महबूबा की आंखें भी महफूज रहें और आशिक का जिगर भी!

अन्य समाचार