मनमोहन सिंह
संयुक्त राष्ट्र के मंच पर हाल ही में जो परमाणु ड्रामा हुआ, उसे देखकर तो यही लगता है कि कूटनीति के गलियारों में अब हॉलीवुड की फिल्मों जैसी स्क्रिप्ट लिखी जाने लगी है। अमेरिका ने ईरान को रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन अंत में नतीजा वही रहा हम तो डूबेंगे सनम, तुम्हें उपाध्यक्ष बना कर ही मानेंगे।
जब अंकल सैम की वीटो वाली लाठी काम न आई
एनपीटी की बैठक शुरू हुई तो अमेरिका को लगा था कि वह ईरान का रास्ता रोक लेगा। लेकिन १२१ देशों ने मिलकर अमेरिका को वह कूटनीतिक झटका दिया है, जिसकी गूंज शायद हाइट हाउस के बेसमेंट तक सुनाई दी होगी। अमेरिका के सहायक सचिव क्रिस्टोफर येव तो इतने भड़क गए कि उन्होंने इसे एनपीटी का अपमान तक कह डाला। अब इसे गुस्सा कहें या खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाला हाल, यह तो वक्त ही बताएगा।
वियतनाम की अध्यक्षता और ईरान का जलवा
इस बार एनपीटी की कमान वियतनाम के हाथ में है, जो रूस और चीन का खास दोस्त है। ऐसे में ईरान का उपाध्यक्ष बनना अमेरिका के लिए जले पर नमक छिड़कने जैसा है। ईरान के दूत रजा नजाफी ने भी मौका नहीं गंवाया और सीधा नो बॉल पर छक्का जड़ते हुए याद दिला दिया कि उपदेश वो दे रहे हैं जिन्होंने असलियत में बम फोड़े हैं!
इस घटनाक्रम के कुछ मजेदार पहलू
ईरान की दलील, हमारे नेता तो हमेशा से परमाणु हथियारों के खिलाफ थे, अमेरिका बस खामख्वाह अफवाहें पैâला रहा है। (मानो परमाणु कार्यक्रम सिर्फ दिवाली के पटाखे बनाने के लिए था!)
अमेरिका का दर्द, ईरान का चुना जाना शर्मनाक है। (दिल की बात- हमारी चलती तो हम खुद ही अध्यक्ष और खुद ही ३४ उपाध्यक्ष बन जाते!)
गजब की बात यह है कि १९० देश मिलकर दुनिया को परमाणु मुक्त बनाने की कसमें तो खाते हैं, लेकिन हथियार कम करने के नाम पर लखनऊ के नवाब की तरह ‘पहले आप’, ‘पहले आप’ की नौटंकी चलती रहती है!
सारे ड्रामा का निचोड़ यह है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता, बस अपनी-अपनी सुविधा के गठबंधन होते हैं। फिलहाल तो ईरान उपाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठकर मुस्कुरा रहा है और अमेरिका अपनी कूटनीतिक डिक्शनरी में अपमान शब्द के नए मायने ढूंढ रहा है।
