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महाराष्ट्रनामा : ‘ पेड़ पर किसान, नीचे व्यवस्था और बीच में फटता हुआ सुतली बम!’

राजन पारकर

महाराष्ट्र की धरती पर इन दिनों तीन अलग-अलग दृश्य दिखाई दे रहे हैं। कहीं किसान अपने हक के लिए पेड़ पर चढ़ रहा है, कहीं नेता अदृश्य शक्तियों के भरोसे सत्ता का गणित गिन रहे हैं और कहीं जिंदगी यह साबित कर रही है कि उम्र सिर्फ वैâलेंडर की संख्या है, दिल की नहीं। राजनीति, आंदोलन और जीवन—तीनों की अपनी-अपनी पटकथा है। फर्क सिर्फ इतना है कि कहीं दर्शक तालियां बजाते हैं, कहीं माथा पकड़ते हैं और कहीं मुस्कुराकर कहते हैं, ‘अरे भाई, यही तो जिंदगी है!’ किसानों की समस्या जब फाइलों में सो जाती है, तब आंदोलन पेड़ों पर चढ़ जाते हैं। मंत्रालय के सामने पेड़ पर चढ़कर आंदोलन करने वाला कार्यकर्ता सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस बेचैनी का प्रतीक है जो खेतों से निकलकर सत्ता के दरवाजे तक पहुंच चुकी है। सवाल यह है कि किसान की आवाज सुनने के लिए क्या अब आसमान तक जाना पड़ेगा? सुतली बम की आवाज से कुछ मिनटों के लिए प्रशासन जाग जाता है, लेकिन किसान की पीड़ा वर्षों से क्यों नहीं सुनाई देती? लोकतंत्र की विडंबना देखिए, राष्ट्रगीत भी वहीं गूंजा, आंदोलन भी वहीं हुआ और पुलिस भी वहीं पहुंची। मगर किसान की असली मांग अभी भी कागजों की सीढ़ियां चढ़ रही है।
‘जब राजनीति में भगवान भी वोट गिनने लगें!’
चुनावी मौसम में राजनीति भी बड़े-बड़े रहस्यों का बाजार बन जाती है। कोई समीकरण बताता है, कोई संख्या बताता है और कोई अदृश्य शक्ति का सहारा बताता है। नेताओं के पास अब हर हार-जीत का नया विज्ञान है। कभी हवा चलती है, कभी लहर आती है और कभी अदृश्य शक्ति मैदान में उतरती है, लेकिन जनता सोचती है, अगर शक्ति इतनी ही अदृश्य है, तो फिर उसका हिसाब इतना स्पष्ट वैâसे बताया जाता है? राजनीति में विश्वास भी जरूरी है और गणित भी। क्योंकि मतपेटी खुलने के बाद न नारा चलता है, न दावा, सिर्फ संख्या बोलती है।
‘साठ की उम्र में शादी,
पुराने वैâलेंडर पर नई तारीख!’
समाज ने उम्र के भी अजीब नियम बनाए हैं। जवान होने की तारीख तय, शादी की उम्र तय और सपनों की भी सीमा तय! लेकिन जिंदगी कभी-कभी समाज की बनाई हुई दीवार पर चढ़कर कहती है,‘अभी कहानी बाकी है।’ एक अभिनेत्री ने ६० वर्ष की उम्र में अपना जीवनसाथी चुना। यह घटना उन लोगों के लिए जवाब है जो मानते हैं कि खुशियों की कोई अंतिम तारीख नहीं होती है। रिश्ते उम्र देखकर नहीं, समझ देखकर बनते हैं। दिल अगर जवान है तो जिंदगी का कोई भी अध्याय आखिरी नहीं होता।
कभी किसान पेड़ पर चढ़ता है, कभी नेता अदृश्य शक्तियां खोजता है और कभी इंसान उम्र की सीमाएं तोड़ देता है। यही महाराष्ट्र है, यहां संघर्ष भी खबर बनता है, राजनीति भी कहानी बनती है और जिंदगी भी संदेश दे जाती है, लेकिन इस पूरे नाटक में सबसे महत्वपूर्ण किरदार कौन है? वही जनता-जो सब देखती है, सब सुनती है और सही समय आने पर अपना पैâसला सुनाती है। क्योंकि इतिहास में अंत में वही लिखा जाता है, जो जनता की अदालत तय करती है।

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