मुख्यपृष्ठस्तंभमहाराष्ट्रनामा : ‘पार्टी में निष्ठा अपराध, असली योग्यता अवसरवाद!'

महाराष्ट्रनामा : ‘पार्टी में निष्ठा अपराध, असली योग्यता अवसरवाद!’

राजन पारकर

राष्ट्रवादी कांग्रेस (अजीत पवार गुट) में फिर एक बार लोकतंत्र का नहीं, बल्कि अवसरवाद का विजय उत्सव मनाया गया है। वर्षों तक पार्टी का झंडा ढोने वाले कार्यकर्ताओं को यह समझा दिया गया कि निष्ठा केवल भाषणों में सुनाने की वस्तु है, टिकट पाने की नहीं। कल तक जो व्यक्ति पार्टी के बाहर खड़ा था, आज उसे उम्मीदवार बना दिया गया। और जो लोग वर्षों तक पार्टी की धूप, बारिश और राजनीतिक लाठियां खाते रहे, उन्हें फिर से त्याग और समर्पण का पाठ पढ़ाया जा रहा है।
रामदास गाडे का इस्तीफा केवल एक नेता का इस्तीफा नहीं है। यह उन हजारों कार्यकर्ताओं की पीड़ा है, जो हर चुनाव में पोस्टर लगाते हैं, भीड़ जुटाते हैं, नारे लगाते हैं और अंत में टिकट किसी ऐसे व्यक्ति को मिलते देखते हैं जिसका पार्टी से परिचय भी अभी ताजा होता है। राजनीति में अब विचारधारा नहीं, ‘वेलकम किट’ चलती है। जो जितना नया, वह उतना योग्य। जो जितना पुराना, वह उतना उपेक्षित। यदि यही चलन रहा तो आने वाले दिनों में पार्टी कार्यालय के बाहर बोर्ड लगाना पड़ेगा, ‘पुराने कार्यकर्ताओं का प्रवेश वर्जित है, केवल ताजा आयातित नेताओं का स्वागत है।’
‘गोलियों से नहीं, अब फिल्मों से डर रहा है अंडरवर्ल्ड!’
‘जो कभी मुंबई को डराता था, आज पर्दे पर अपनी छवि देखकर घबरा रहा है!’ समय कितना निर्दयी होता है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण अंडरवर्ल्ड है। जो कभी अपने नाम से शहरों को कांपता हुआ देखना चाहता था, वह आज एक फिल्मी किरदार से परेशान हो रहा है। कहते हैं कि एक फिल्म में किसी ‘बड़े साहब’ को बीमार, कमजोर और बिस्तर पर पड़ा हुआ दिखाया गया। बस, इसके बाद पूरी डी कंपनी बेचैन हो गई। अजीब विडंबना है! जिन लोगों ने वर्षों तक कानून को चुनौती दी, वे अब फिल्मी कहानी को चुनौती देने निकल पड़े हैं।
ऐसा लगता है कि अंडरवर्ल्ड की सबसे बड़ी समस्या अब पुलिस नहीं, बल्कि फिल्म लेखक बन गए हैं। गोलियों से बचने वाले लोग अब संवादों से घायल हो रहे हैं। मुंबई को डराने वाले लोग आज अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए छटपटा रहे हैं। शायद उन्हें पहली बार एहसास हुआ है कि बंदूक की उम्र सीमित होती है, लेकिन व्यंग्य की गोली पीढ़ियों तक लगती रहती है। अगर किसी अपराधी को अपनी ताकत साबित करने के लिए यह दिखाना पड़े कि ‘मैं अभी जिंदा हूं’ तो समझ लीजिए कि उसका सबसे बड़ा दुश्मन पुलिस नहीं, समय बन चुका है।
‘विलय का विवाह मंडप सजा था, लेकिन दूल्हे बदल गए!’
राजनीति में विलय की चर्चाएं अक्सर प्रेम कहानी की तरह शुरू होती हैं और संपत्ति विवाद की तरह समाप्त होती हैं। सुनील तटकरे ने स्वीकार किया कि दोनों राष्ट्रवादी गुटों के बीच विलय की चर्चाएं हुई थीं। अर्थात राजनीतिक रसोई में खिचड़ी पक रही थी। मसाले डाले जा चुके थे, परंतु सत्ता की आंच बदलते ही पूरी रसोई ठंडी पड़ गई।
कहा जा रहा है कि दादा के निधन के बाद परिस्थितियां बदल गर्इं। राजनीति में परिस्थितियां कम और स्वार्थों का गणित ज्यादा बदलता है। जब तक लाभ दिखाई देता है तब तक एकता की बातें होती हैं। जैसे ही समीकरण बदलते हैं, सिद्धांत भी छुट्टी पर चले जाते हैं। जनता को बताया जाता है कि यह सब विचारधारा का प्रश्न है। लेकिन जनता भी अब अनुभवी हो चुकी है। उसे पता है कि राजनीति में विचारधारा अक्सर वह वस्त्र होती है जिसे मौसम के अनुसार बदला जाता है। विलय नहीं हुआ, लेकिन एक बात स्पष्ट हो गई, राजनीति में रिश्ते खून से नहीं, सत्ता से बनते हैं। और सत्ता का रिश्ता जितनी जल्दी बनता है, उससे कहीं ज्यादा जल्दी टूट भी जाता है।
जनता आज भी यही सोच रही है कि जिन नेताओं को अपना घर तय करने में वर्षों लग जाते हैं, वे राज्य का भविष्य तय करने का दावा आखिर किस आत्मविश्वास से करते हैं?

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