राजन पारकर
वरिष्ठ नेता नाराज, युवा वारिस तैयार और बैठक में अनुपस्थित नेताओं की चर्चा ज्यादा!
मुंबई में दादा गुट की अहम बैठक हुई, लेकिन चर्चा एजेंडे की कम और अनुपस्थित चेहरों की ज्यादा रही। वरिष्ठ नेता मौजूद थे, कुछ नाराज थे, कुछ नाराज दिख रहे थे और कुछ इतने नाराज थे कि बैठक में आए ही नहीं। प्रफुल्ल पटेल मुंबई में होते हुए भी बैठक से दूर रहे, जिससे राजनीतिक गलियारों में कल्पनाओं का मानसून शुरू हो गया। उधर, सुनेत्रा पवार और पार्थ पवार को लेकर लिए गए पैâसलों ने पुराने नेताओं को यह एहसास दिला दिया कि पार्टी अब ‘सीनियर सिटीजन क्लब’ से सीधे ‘पैâमिली मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड’ की ओर बढ़ रही है। बैठक में छगन भुजबल और सुनील तटकरे के बीच हुई कथित नोकझोंक ने माहौल ऐसा बना दिया जैसे विधानसभा नहीं, किसी रियलिटी शो का एलिमिनेशन राउंड चल रहा हो। राजनीति के जानकारों का कहना है कि पार्टी में सब कुछ ठीक है, बस नेता एक-दूसरे से थोड़ा कम और मीडिया से थोड़ा ज्यादा बात कर रहे हैं।
-महायुति में सीटों से ज्यादा मुलाकातों की राजनीति गर्म
-बैठक पर बैठक, मुलाकात पर मुलाकात, टिकट अभी भी वेटिंग लिस्ट में!
महायुति में इन दिनों राजनीतिक गतिविधियां इतनी तेज हो गई हैं कि नेताओं की गाड़ियों से ज्यादा उनके वैâलेंडर दौड़ रहे हैं। स्थानीय निकाय और विधान परिषद चुनावों में सीट बंटवारे को लेकर तनाव बढ़ा तो मुख्यमंत्री ने तुरंत आपात बैठक बुला ली। यानी मामला ‘सब कंट्रोल में है’ वाले स्तर से थोड़ा ऊपर पहुंच चुका है। इसी बीच अर्जुन खोतकर की सुनेत्रा पवार से मुलाकात ने अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषक अब मुलाकात की तस्वीरों में मुस्कान का एंगल नापकर टिकट की संभावना निकाल रहे हैं। पार्टी कार्यकर्ता पूछ रहे हैं कि टिकट योग्यता से मिलेगा, निष्ठा से मिलेगा या फिर सेल्फी की क्वालिटी देखकर? राजनीति में मुलाकातें कभी साधारण नहीं होतीं। यहां चाय पीने जाओ तो खबर बनती है, हाथ मिलाओ तो समीकरण बदलते हैं और अगर बैठक के बाद मुस्कुराकर बाहर निकलो तो अगले दिन मंत्री पद की चर्चा शुरू हो जाती है। फिलहाल, महायुति में टिकट से ज्यादा चर्चा टिकट मिलने की संभावना की हो रही है।
-मौसम विभाग भी कन्फ्यूज:
-छाता लें, पंखा लें या दोनों साथ रखें?
-कहीं बारिश की एंट्री, कहीं गर्मी का अत्याचार;
-जनता बोली-आखिर मौसम चाहता क्या है?
महाराष्ट्र में मौसम ने इन दिनों गठबंधन सरकार की तरह व्यवहार शुरू कर दिया है। एक जिले में तेज बारिश हो रही है, तो दूसरे जिले में सूरज ऐसा तप रहा है जैसे बिजली बिल की वसूली खुद कर रहा हो। मराठवाड़ा में बादल घूम रहे हैं, बूंदा-बांदी की संभावना जताई जा रही है, जबकि विदर्भ में गर्मी लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि कहीं वे गलती से तंदूर के अंदर तो नहीं आ गए। मौसम विभाग रोज नया अनुमान जारी कर रहा है और जनता रोज नया अंदाजा लगा रही है। किसान मानसून का इंतजार कर रहे हैं, कर्मचारी छुट्टी का और मौसम विभाग अपने अगले अपडेट का। फिलहाल, स्थिति यह है कि घर से निकलते समय छाता, पानी की बोतल, तौलिया और धूप का चश्मा—सब साथ रखना पड़ रहा है, क्योंकि मौसम ने तय कर लिया है कि वह किसी एक विचारधारा से बंधकर नहीं रहेगा।
