राजन पारकर
सुप्रिया सुले ने पुणे की बढ़ती अपराध की घटनाओं पर सवाल उठाकर सरकार को असहज कर दिया है। उनका कहना है कि अपराध का मुद्दा राजनीति का नहीं, समाज की सुरक्षा का है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आजकल हर सवाल को विपक्ष का षड्यंत्र और हर आलोचना को राजनीतिक अपराध मान लिया जाता है। सुले का आरोप कि कुछ लोगों ने अजीत पवार के ही बयानों को खारिज करने का पाप किया, सत्ता के भीतर चल रहे अंतर्विरोधों की तरफ इशारा करता है। यह वही राजनीति है जहां सुबह का बयान शाम तक सरकारी लाइन के खिलाफ घोषित कर दिया जाता है। पुणे में अपराध बढ़ रहा है, महिलाएं असुरक्षित महसूस कर रही हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में असली चिंता यह है कि किसका बयान किसके खिलाफ चला गया। जनता सुरक्षा मांग रही है और नेता स्पष्टीकरण। जब शासन का ध्यान अपराधियों पर कम और आलोचकों पर ज्यादा हो जाए, तब लोकतंत्र के आईने में सवालों के चेहरे साफ दिखाई देने लगते हैं। एक तरफ बेटे की टिकट न मिलने का दर्द, दूसरी तरफ मित्र पक्ष द्वारा राजनीतिक जमीन खिसकाने की शिकायत और तीसरी तरफ कानून-व्यवस्था पर उठते सवाल। कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि सत्ता का रथ बाहर से जितना मजबूत दिखाई देता है, भीतर उसके पहियों में उतनी ही चरमराहट सुनाई दे रही है। कोई नसीब को दोष दे रहा है, कोई साथी को और कोई सरकार को आईना दिखा रहा है। जनता यह सब देखकर बस इतना पूछ रही है, ‘साहब, सत्ता की लड़ाई कब तक चलेगी? कभी जनता की बारी भी आएगी या नहीं?’
‘नसीब का बहाना या वारिस का तराना?’
जब तक दूसरों के बेटे विधायक बनते रहे, तब तक लोकतंत्र का सूरज चमकता रहा; लेकिन जैसे ही अपने बेटे की विधायकी की गाड़ी स्टेशन पर अटक गई, अचानक किस्मत, नसीब और शायरी की याद आ गई। गुलाबराव पाटील साहब आजकल राजनीति कम और दर्दभरी गजलें ज्यादा सुनाते दिखाई दे रहे हैं। ‘नसीब में होगा तो उठाकर आएगा…’ कहकर उन्होंने मानो यह स्वीकार कर लिया कि राजनीति में अब परिश्रम, संघर्ष और जनाधार से ज्यादा महत्व गठबंधन के गणित और सीटों की बोली का है। सवाल यह है कि अगर टिकट बेटे को मिल जाता तो क्या उसे नसीब का चमत्कार कहा जाता या नेतृत्व की दूरदृष्टि? सत्ता के महलों में जब वारिसों की महत्वाकांक्षाएं टकराती हैं, तब शेरो-शायरी भी राजनीतिक प्रेस नोट बन जाती है। जनता रोजगार और विकास का नसीब ढूंढ रही है और नेता अपने वारिसों का राजनीतिक भविष्य।
‘मित्र पक्ष या भस्मासुर?’
अब्दुल सत्तार का दर्द भी कम दिलचस्प नहीं है। चुनाव से पहले सब भाई-भाई, सत्ता आने के बाद वही भाई अगर कंधे पर हाथ रखने के बजाय गर्दन पर हाथ रखने लगे, तो शिकायत स्वाभाविक है। सत्तार साहब का आरोप है कि मित्र पक्ष यदि सहयोगी दल को ही निगलने लगे तो गठबंधन नहीं, राजनीतिक वनराज्य बन जाता है जहां बड़े पेड़ की छाया में छोटे पौधे सूखने लगते हैं। यह बयान केवल एक जिले का विवाद नहीं, बल्कि महायुति के भीतर पनप रही बेचैनी का सार्वजनिक उद्घोष है। विडंबना देखिए, सत्ता साझा करने वाले नेता आज अपने ही सहयोगियों से संरक्षण मांग रहे हैं। जो कल विपक्ष पर अत्याचार का आरोप लगाते थे, वे आज मित्र पक्ष के व्यवहार को विपक्ष से भी बदतर बता रहे हैं। राजनीति का यह नया सिद्धांत बड़ा अद्भुत है-दुश्मन से कम और दोस्त से ज्यादा खतरा महसूस हो रहा है।
