सामना संवाददाता / नई दिल्ली
चुनाव आयोग ने लोकतंत्र को नया खेल सिखा दिया है। पहले विशेष गहन पुनरीक्षण कराइए, मसौदा मतदाता सूचियों में करीब १३ करोड़ नाम बाहर दिखाई दें और फिर अधिकारियों को आदेश दीजिए, जाइए, छूटे हुए मतदाताओं को खोजकर वापस लाइए! मानो रेलवे यात्रियों को स्टेशन पर छोड़ दे और फिर घोषणा कर, गुम हुए यात्री कृपया ट्रेन में लौट आएं।
आयोग का कहना है कि मतदाता पंजीकरण एक सतत प्रक्रिया है और कोई भी पात्र नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित नहीं रहना चाहिए। बात बिल्कुल सही है। लेकिन सवाल यह है कि अगर पात्र नागरिकों को अब खोजा जाना है, तो पुनरीक्षण के दौरान उन्हें खोज कौन रहा था? नाम जोड़ने के लिए फिर फॉर्म-६ भराया जाएगा। यानी मतदाता पहले सूची में था, व्यवस्था ने उसे बाहर दिखाया और अब अपनी मौजूदगी दोबारा साबित करने की जिम्मेदारी भी उसी पर!
दो सदस्यों की आपत्ति, फिर भी मशीनरी बेफिक्र?
और मजा देखिए, इसी फॉर्म और संबंधित प्रक्रियाओं पर आयोग के दो सदस्यों ने आपत्तियां दर्ज की थीं। मगर चुनावी मशीनरी शायद रेलगाड़ी की तरह चलती है। दो लोग सीटी बजाते रहें, इंजन अपनी दिशा में जाता रहता है।
यह सही है कि मसौदा सूची से नाम गायब होना अंतिम निष्कासन नहीं है। दावे, सत्यापन और दोबारा नाम दर्ज कराने का रास्ता खुला है। लेकिन १३ करोड़ कोई मामूली संख्या नहीं, यह करोड़ों नागरिकों के मताधिकार से जुड़ा सवाल है।
मतदाता जिंदा, पता वही, फिर सूची में गायब क्यों?
समझो… मतदाता जीवित है, पता वही है, दस्तावेज भी मौजूद हैं, बस लोकतंत्र की सूची में उसकी लोकेशन अस्थायी रूप से ‘बंद’ है! अब व्यवस्था उसे खोजेगी, फिर उसका सत्यापन करेगी और फिर वही मतदाता साबित करेगा कि वह वास्तव में मतदाता है। सवाल सीधा है। पहले नाम गायब करने की नौबत आई ही क्यों?
