मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश : बोलो भाई ज्ञानू! कहां ले आए जानू

तरकश : बोलो भाई ज्ञानू! कहां ले आए जानू

-धनुर्धर

अपने देश के अभूतपूर्व पीएम नरेंद्र मोदी…। माफ कीजिएगा, मैंने गौर किया कि आपकी भवें तन चुकी हैं। सो, आगे बढ़ने से पहले छोटा स्पष्टीकरण तो इसी अभूतपूर्व पर। भई, अभूतपूर्व इसलिए कि भूतपूर्व नहीं लिख सकते। उन्हें पीएम से भूतपूर्व पीएम बना सके, ऐसी औकात किसी की नहीं। कम से कम उन्हें तो इस बात का पक्का विश्वास है।
बंदे तैनात हैं
और यह विश्वास अकारण भी नहीं। उन्होंने बहुत मेहनत की है इसके लिए। बल्कि ज्यादा सटीकता से कहें तो मेहनत करवाई है अपने बंदों से। कोई भी महत्वपूर्ण जगह ऐसी नहीं है, जहां मोदी जी के बंदे तैनात न हों। इन बंदों की बदौलत मोदी जी निश्चिंत हैं। विपक्षी दल लाख चिल्ल-पों मचा लें, चाहे जैसे मुद्दे उठा लें, उन पर जितना चाहे हंगामा कर लें, न तो वे इन आवाजों को संसद के भीतर पहुंचा सकते हैं, न इनके जरिए न्यायपालिका के मुंह से कोई ऐसी बात निकलवा सकते हैं, जिससे मोदी जी की सत्ता पर आंच आने की कोई संभावना भी बनती हो और न ही इनके जरिए एक हद से ज्यादा वोट हासिल कर सकते हैं।
बखूबी पहचानते हैं खूबी
सो, मोदी जी को ही नहीं, मुझे भी पक्का यकीन है कि उन्हें पीएम से भूतपूर्व पीएम बनाना उनके जीते जी संभव नहीं। ऐसे में, जो भूतपूर्व न हो सके, उसे अभूतपूर्व नहीं तो और क्या कहेंगे। तो अपने इस लोकतंत्र के अभूततपूर्व पीएम नरेंद्र मोदी में यूं तो जमाने ने लाखों खूबियां देखी हैं, लेकिन मुझसे पूछें तो उनकी सबसे बड़ी खूबी है खूबी पहचानने की। लाखों-करोड़ों की भीड़ में वे उस बंदे को तत्काल पहचान लेते हैं, जो उनके काम आने वाला होता है।
सबके वश का नहीं
अब उनका काम भी तो ऐसा ही होता है, जो सबके वश का नहीं होता। इन्हें वही अंजाम दे सकता है, जो अपनी अंतरात्मा की आवाज से लेकर देश और समाज की तमाम सच्ची आवाजों के सामने चट्टान की तरह अडिग खड़ा रह सके, उचित-अनुचित के सवालों को हंसता हुआ झेल जाए, तर्क और विवेक को चुटकियों में मसल दे, संविधान और कानून को हवा में उड़ाने की सामर्थ्य रखता हो, लेकिन फिर भी मोदी जी के सामने जबान तो क्या नजरें भी ऊंची करने की हिमाकत न करता हो।
हर शाख पर
ऐसे लोग आसानी से तो मिलते नहीं। पर मोदी जी की नजर का कमाल कहिए कि ऐसे लोग उनकी नजरों से बच नहीं पाते। वे इन लोगों को देखते हैं, पहचानते हैं और फिर अपनी टीम में शामिल करके कोई न कोई ऐसी अहम जगह दे देते हैं, जहां वे खुद को कृतकृत्य मानें और मोदी जी के काम आएं। वैसे तो हर शाख पर आपको ऐसे बंदे बैठे मिल जाएंगे, लेकिन एक शाख आजकल बहुत चर्चा में है।
टापते रह गए वोटर
उस शाख पर बैठे, सॉरी बैठाए गए बंदे को यूं तो सिर्फ चुनाव करवाना था और इस तरह से करवाना था कि लोग चाहे जिस को भी वोट दें, सत्ता उसी पार्टी को मिले। मगर, इतना सा काम तो उस शाख पर पहले से मौजूद तमाम बंदे कर ही रहे थे। यह बंदा खास था। सो, बिना देर किए हरी झंडी दिखा दी मोदीजी ने कि खेल जाओ पट्ठे। पट्ठे ने भी फिर सारे घोड़े खोल दिए। कहा, वोटर वही जो नेता मन भाए। उसने एसआईआर का ऐसा चक्कर चलाया कि लाखों नहीं, करोड़ों वोटर टापते रह गए और वोटर लिस्ट से उनका नाम ऐसे गायब हुआ जैसे गधे के सिर से सींग।
बैठने को जगह नहीं
लोग अब होश में आए हैं, जब पट्ठा अपना काम पूरा कर चुका। अब तो उसे शेष जीवन आराम करना है। पर अक्ल के अंधे कुछ लोग हैं जो जीवन तो छोड़िए, उसके कार्यकाल पर ही विराम लगाने की जिद ले बैठे हैं। सॉरी बैठ तो नहीं पाए हैं। इस बार जंतर-मंतर से लेकर शिवाजी पार्क तक सभी ऐसी जगहें जाम कर दी गई हैं, जहां ये लोग बैठ सकते थे। सो, बेचारे सड़कों पर ही खड़े-खड़े प्रदर्शन करने को मजबूर हैं।
शर्म भी शरमाती है
फिर भी सपना देख रहे हैं इस मुख्य बंदे के इस्तीफे का। उन्हें लगता है कि इस बंदे को शरम आ जाएगी और वह अपने पद से इस्तीफा दे देगा। उसे नहीं आई तो मोदी जी को ही शरम आ जाएगी और वे बहला-फुसलाकर इससे इस्तीफा ले लेंगे। उन्हें नहीं मालूम कि मोदी जी और उनके इन बंदों से तो शर्म भी शरमाती है। पर सपने देखने से किसी को क्यों रोकना। कहते हैं, लोकतंत्र में सपने देखने की सबको आजादी है। और कम से कम इस आजादी पर अभी नजर नहीं पड़ी है मोदी जी की।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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